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ॐ

छठ पूजा 2143: Jersey City, New Jersey

कार्तिक शुक्ल षष्ठी: सूर्य को अस्त और उदय काल में अर्घ्य

📍 Jersey City, New Jersey, America (United States)
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छठ पूजा · 2143
📍 Jersey City, New Jersey, America (United States)
नवम्बर 12, 2143
कार्तिक शुक्ल षष्ठी: सूर्य को अस्त और उदय काल में अर्घ्य
Four Days of Chhath · Jersey City
🛁
ਨਹਾਯ ਖਾਯ
🗓 November 10, 2143
🌙 ਤਿਥੀ
Chaturthi
🌅 ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ
06:38:29 AM
ritual bath 🕉
🌇 ਸੂਰਜ ਛਿਪਣ
04:42:10 PM
🍚
ਲੋਹੰਡਾ / ਖਰਨਾ
🗓 November 11, 2143
🌙 ਤਿਥੀ
Panchami
🌅 ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ
06:39:40 AM
🌇 ਸੂਰਜ ਛਿਪਣ
04:41:12 PM
fast-breaking kheer 🕉
🌅
ਛਠ ਪੂਜਾ (ਸਾਯੰ ਅਰਘਯ)
🗓 November 12, 2143
🌙 ਤਿਥੀ
Shashti
🌅 ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ
06:40:50 AM
🌇 ਸੂਰਜ ਛਿਪਣ
04:40:15 PM
evening offering 🕉
🌅 ਪਿਛਲਾ ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨਾ
ਨਵੰਬਰ 11
06:39:40 AM
🌘 ਸ਼ਸ਼ਠੀ ਸ਼ੁਰੂ
ਨਵੰਬਰ 11
01:25:42 PM
🌅 ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ
ਨਵੰਬਰ 12
06:40:50 AM
🌒 ਸ਼ਸ਼ਠੀ ਸਮਾਪਤ
ਨਵੰਬਰ 12
02:04:54 PM
🌇 ਸੂਰਜ ਛਿਪਣ
ਨਵੰਬਰ 12
04:40:15 PM
🌅 ਅਗਲਾ ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨਾ
ਨਵੰਬਰ 13
06:42:01 AM
🌄
ਉਸ਼ਾ ਅਰਘਯ
🗓 November 13, 2143
🌙 ਤਿਥੀ
Saptami
🌅 ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ
06:42:01 AM
morning offering 🕉
🌇 ਸੂਰਜ ਛਿਪਣ
04:39:20 PM
इस दिन का पंचांग · Jersey City
🌓 तिथि
षष्ठी
⭐ नक्षत्र
उत्तराषाढ़ा
🔯 योग
शूल
🌅 सूर्योदय
06:40:50 AM
🌇 सूर्यास्त
04:40:15 PM
परिचय

छठ पूजा

छठ पूजा सबसे प्राचीन और कठोर वैदिक पर्वों में से एक है: सूर्य देव और छठी मैया (छठे दिन की देवी, दिव्य माँ का एक रूप) की चार दिवसीय आराधना, जो मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाई जाती है। अधिकांश हिंदू पर्वों के विपरीत, छठ में कोई प्रतिमा नहीं होती: स्वयं सूर्य ही देवता हैं, जिनकी पूजा नदी तट पर सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सीधे की जाती है।

यह चार दिवसीय पर्व एक निश्चित क्रम का पालन करता है। पहले दिन (नहाय खाय) भक्तजन नदी में विधिवत स्नान करते हैं, पवित्र जल घर लाते हैं, और चावल, चना दाल, तथा लौकी का एक शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरी शाम (खरना) दिनभर के व्रत का समापन सूर्यास्त पर गुड़ और नए चावल से बनी खीर के साथ होता है, जिसके तुरंत बाद एक और व्रत आरंभ होता है जो 36 घंटे तक बिना जल के चलता है।

इसका चरम बिंदु है सायं अर्घ्य (षष्ठी की शाम को दिया जाने वाला सूर्यास्त अर्घ्य), जब पीले और नारंगी वस्त्रों में सजे हज़ारों भक्तजन नदियों में कमर तक खड़े होकर बाँस की टोकरियों (सूप) में भोग लिए रहते हैं: फल, गन्ना, ठेकुआ (एक पका हुआ मिष्ठान), और दीये। पुजारी अस्ताचल सूर्य के लिए वैदिक मंत्रों का जाप करते हैं। यह चक्र अगली भोर उषा अर्घ्य (सूर्योदय अर्घ्य) के साथ पूर्ण होता है, जब अंततः व्रत तोड़ा जाता है।

परंपरा और विधि
🌅
सायं अर्घ्य
षष्ठी की शाम को दिया जाने वाला सूर्यास्त अर्घ्य छठ का आध्यात्मिक चरम बिंदु है। भक्तजन फलों और दीयों से भरी बाँस की सूप टोकरियाँ लेकर नदियों में उतरते हैं, और सूर्य के क्षितिज में डूबते समय प्रार्थना में खड़े रहते हैं।
🌄
उषा अर्घ्य
अगली सुबह दिया जाने वाला सूर्योदय अर्घ्य इस व्रत को पूर्ण करता है। भक्तजन भोर से पहले नदी पर लौटते हैं, उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं, और 36 घंटे के कठिन जल-रहित व्रत को तोड़ते हैं।
🥘
नहाय खाय और खरना
पहला दिन: नदी में स्नान, शुद्ध भोजन, घर लाया गया पवित्र जल। दूसरा दिन: सूर्यास्त तक पूर्ण व्रत, जिसका समापन परिवार और पड़ोसियों के साथ बाँटी जाने वाली गुड़ की खीर (खरना प्रसाद) से होता है।
🎋
बाँस का सूप (टोकरी)
बाँस का सूप (एक चपटी टोकरी) मुख्य अनुष्ठानिक वस्तु है, जिसमें मौसमी फल, गन्ना, ठेकुआ, नारंगी, और चंदन भरा जाता है। इसे दोनों अर्घ्यों के समय सूर्य को अर्पित किया जाता है।
🕯️
36 घंटे का निर्जला व्रत
खरना की शाम से लेकर उषा अर्घ्य के सूर्योदय तक, भक्तजन पूर्ण निर्जला व्रत रखते हैं: न अन्न, न जल। यह दुर्लभ व्रत मुख्यतः स्त्रियों द्वारा अपनी संतान और परिवार के कल्याण की कामना करते हुए रखा जाता है।
☀️
मूर्ति-रहित पूजा
छठ अनूठा है: इसमें किसी मूर्ति का प्रयोग नहीं होता। सूर्य देव की पूजा सीधे की जाती है। यह छठ को प्रारंभिक वैदिक पूजा पद्धति के निकट रखता है, जो मूर्ति-आधारित भक्ति परंपराओं से भी पुरानी है।
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