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ॐ

दुर्गा पूजा 1941

महालय से विजया दशमी तक: माता की महान शारदीय पूजा

📍 बेंगलुरु, भारत
दुर्गा पूजा · 1941
📍 बेंगलुरु, भारत
शुक्रवार, सितम्बर 26, 1941
महालय से विजया दशमी तक: माता की महान शारदीय पूजा
दुर्गा पूजा: पूजा के दिन · बेंगलुरु
🪔
महालया
🗓 शनिवार, सितम्बर 20, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:41 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:17:00 अपराह्न
🪔
षष्ठी (बोधन)
🗓 शुक्रवार, सितम्बर 26, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:45 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:12:45 अपराह्न
🪔
महा सप्तमी (नवपत्रिका)
🗓 शनिवार, सितम्बर 27, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:46 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:12:03 अपराह्न
🪔
महा अष्टमी
🗓 रविवार, सितम्बर 28, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:47 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:11:21 अपराह्न
🪔
संधि पूजा
🗓 रविवार, सितम्बर 28, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:47 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:11:21 अपराह्न
🪔
महा नवमी
🗓 सोमवार, सितम्बर 29, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:49 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:10:40 अपराह्न
🪔
विजया दशमी (सिंदूर खेला)
🗓 मंगलवार, सितम्बर 30, 1941
🌅 सूर्योदय
06:09:51 पूर्वाह्न
🌇 सूर्यास्त
06:09:58 अपराह्न
परिचय

दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा (দুর্গাপূজা) बंगाल का महान शरद उत्सव है, जब माँ दुर्गा अपनी संतानों लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश के साथ अपने माता पिता के घर आती हैं। परंपरा के अनुसार श्रीराम ने रावण से युद्ध से पहले असमय उनकी पूजा की थी; यही अकाल बोधन तब से शरद पूजा के रूप में मनाया जाता है।

महालया भोर में तर्पण और महिषासुरमर्दिनी पाठ के साथ देवी पक्ष का आरंभ करती है। षष्ठी को बेल वृक्ष के नीचे देवी का जागरण (बोधन) होता है। महा सप्तमी को नवपत्रिका, देवी के रूप में बँधे नौ पौधे, भोर में नदी में स्नान कराकर गणेश के पास स्थापित की जाती है। महा अष्टमी को कुमारी पूजा और अष्टमी तथा नवमी के संधिकाल में एक सौ आठ दीपों और कमलों के साथ संधि पूजा होती है, और महा नवमी को अंतिम पूजा।

विजया दशमी को सुहागिनें सिंदूर खेला में देवी को और एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, प्रतिमाएँ विसर्जन के लिए नदी में ले जाई जाती हैं, और परिवार "शुभो बिजोया" कहकर एक दूसरे का अभिवादन करते हैं।

परंपरा और विधि
🌳
बोधन
षष्ठी को बेल वृक्ष के नीचे देवी का जागरण होता है।
🌿
नवपत्रिका
सप्तमी को देवी के रूप में बँधे नौ पौधों को भोर में स्नान कराया जाता है।
🪔
संधि पूजा
अष्टमी और नवमी के संधिकाल में 108 दीप और कमल।
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