भीष्म (जया) एकादशी
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को नंदन वन में इंद्र की सभा के उस समय के विषय में बताया, जब गंधर्व गायक माल्यवान और एक दिव्य नर्तकी साथ साथ प्रस्तुति दे रहे थे। एक दूसरे के प्रेम में खोकर वे बेसुरा गाने और बेताल नाचने लगे।
उनका ध्यान भटका देखकर इंद्र ने उन्हें पिशाच बनकर धरती पर गिरने का शाप दे दिया। उन्होंने स्वयं को हिमालय के एक ठंडे शिखर पर पाया, जहाँ वे भूख, ठंड और पश्चाताप से पीड़ित रहे। माघ शुक्ल की एकादशी को वे इतने दुखी थे कि उन्होंने कुछ नहीं खाया, कड़कड़ाती रात भर जागते रहे, और अपने दोष पर पश्चाताप किया।
अनजाने में ही उन्होंने जया एकादशी का उपवास और जागरण कर लिया था। द्वादशी की भोर तक विष्णु की कृपा से वे शाप से मुक्त हो गए, अपने दिव्य रूप फिर से पा गए और स्वर्ग लौट गए, जहाँ स्वयं इंद्र ने भी उनका सम्मान किया। अनेक प्रदेशों में यह दिन भीष्म के स्मरण के साथ भी मनाया जाता है, जिनकी अष्टमी इसके ठीक पहले पड़ती है।
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