श्री कूर्म जयंती
श्री कूर्म जयंती भगवान विष्णु के द्वितीय अवतार कूर्म (दिव्य कच्छप) के प्रकट होने का उत्सव है, जो वैशाख पूर्णिमा को मनाया जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत की खोज में क्षीरसागर का मंथन किया, जिसमें मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। परंतु मंदराचल का कोई ठोस आधार न होने के कारण वह सागर में डूबने लगा। इसे सहारा देने हेतु भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म का रूप धारण किया और सागर में डुबकी लगाकर पर्वत का सम्पूर्ण भार अपनी पीठ पर धारण कर लिया, जिससे मंथन निर्बाध जारी रह सका।
इस मंथन से अंततः चौदह अनमोल रत्न प्राप्त हुए, जिनमें देवी लक्ष्मी, दिव्य गज ऐरावत, कामधेनु गाय, और अंत में अमृत कलश लिए धन्वंतरि सम्मिलित थे। कूर्म का यह स्थिर, अडिग सहारा धैर्य तथा किसी भी महान कार्य के पीछे दृढ़ आधार का प्रतीक माना जाता है।
तिथि-निर्णय सायंकाल-व्यापिनी नियम (धर्मसिन्धु के अनुसार) से होता है: यदि पूर्णिमा तिथि जिस दिन प्रारम्भ हो, उस दिन सूर्यास्त से पूर्व के अंतिम 3 मुहूर्तों को पूर्णतः व्याप्त करे, तो वही दिन लिया जाता है; यदि यह दोनों दिन व्याप्त करे, अथवा किसी भी दिन व्याप्त न करे, तो अगला दिन लिया जाता है।
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