शनि जयंती मंद गति वाले ग्रह शनैश्चर का जन्मदिन है, जो सूर्य और छाया के पुत्र हैं। यह अमांत पंचांग के अनुसार वैशाख की अमावस्या को मनाई जाती है, वही दिन जिसे पूर्णिमांत पंचांग ज्येष्ठ की अमावस्या कहता है।
स्कन्द पुराण के अवंती खंड में बताया है कि छाया ने जुड़वाँ संतान को जन्म दिया, नदी तापी और शनैश्चर, "जो सब लोकों को तपाते हैं"। काशी खंड में वाराणसी में शनैश्चरेश्वर के रूप में शनि की पूजा होती है, और जो शनिवार को उनके दर्शन करता है वह शनि की पीड़ा से मुक्त होता है।
वही पुराण प्रातःकाल पढ़ने के लिए शनि के नाम देता है: सौरि, शनैश्चर, मंद, कृष्ण, अनंत, अंतक, यम, पिंग, छायासुत, बभ्रु, स्थावर और पिप्पलायन। वह कहता है कि जो इन्हें पढ़ता है उसे शनि की पीड़ा कभी नहीं होती। जब अमावस्या शनिवार को पड़े, तब स्नान, दान और श्राद्ध करना चाहिए।
"Sauri, Shanaishchara, Manda, Krishna, Ananta, Antaka, Yama, Pinga, Chhayasuta, Babhru, Sthavara, Pippalayana: whoever recites these names of Shani at dawn never suffers the affliction of Shani."
Skanda Purana, Avanti Khanda 56
परंपरा और विधि
☀️
सूर्य और छाया के पुत्र
छाया ने जुड़वाँ संतान को जन्म दिया, नदी तापी और शनैश्चर (स्कन्द पुराण, अवंती खंड)।
🌑
वैशाख अमावस्या
वैशाख की अमावस्या (अमांत), पूर्णिमांत गणना में ज्येष्ठ अमावस्या वाला ही दिन।
📿
प्रातः नाम-पाठ
प्रातःकाल शनि के नाम पढ़ें, तो उनकी पीड़ा नहीं आती।
🪐
शनिवारी अमावस्या
जब अमावस्या शनिवार को पड़े: स्नान, दान और श्राद्ध।