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उपाकर्म-निर्णय: उपाकर्म-दिन का शास्त्रीय निर्णय

प्रत्येक वेद और सूत्र के लिए, किसी भी वर्ष, उपाकर्म का दिन कैसे निश्चित होता है: पहले नियम, फिर श्लोक और उनकी व्याख्या

📅 अपने शहर और किसी भी वर्ष की तिथियाँ: तीनों वेद · यजुर् · ऋग् · साम · USA: २०२६ · २०२७

© प्रतिलिप्यधिकार सूचना

© 2006–2026 पण्डित महेश शास्त्रीजी और mypanchang.com। सर्वाधिकार सुरक्षित। यह लेख, इसके पाठ, अनुवाद, संकलन, क्रम, तालिकाएँ और निर्णय सहित, प्रतिलिप्यधिकार द्वारा संरक्षित है। लेखक की पूर्व लिखित अनुमति के बिना इसका कोई भी अंश किसी भी रूप या माध्यम में, मुद्रित या इलेक्ट्रॉनिक, प्रतिलिपि, पुनर्प्रकाशन, अनुवाद, रूपान्तरण या वितरण नहीं किया जा सकता। अनधिकृत प्रतिलिपि पर वैधानिक कार्यवाही की जाएगी।

उपाकर्म-निर्णय

ऋग्, यजुर् और साम वेद के उपाकर्म-दिन का निर्णय, दोष और विकल्प-दिन के सिद्धान्त सहित

पण्डित महेश शास्त्रीजी, पञ्चाङ्गकर्ता एवं सिद्धान्ती, mypanchang.com

सारांश

यह अध्ययन प्राथमिक धर्मशास्त्र-साहित्य से वे नियम प्रस्तुत करता है जिनसे किसी भी वर्ष उपाकर्म (वेदाध्ययन का वार्षिक पुनरारम्भ, अध्यायोपाकरण) का दिन निश्चित होता है: ऋग्वेद, शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद (काण्व, माध्यन्दिन, आपस्तम्ब, बौधायन, हिरण्यकेशी) और सामवेद के लिए। इसमें स्थापित है: (१) प्रत्येक वेद का मुख्य दिन और दो दिनों में फैली तिथि या नक्षत्र का नियम; (२) वे दोष जो सभी को रोकते हैं (ग्रहण, संक्रान्ति, अधिमास) और वे जो केवल प्रथम उपाकर्म को रोकते हैं (गुरु-अस्त, शुक्र-अस्त); (३) सूत्र-विशेष विकल्प-क्रम; और (४) अन्तिम नियम: शान्ति-सहित मुख्य दिन पर अनुष्ठान। वसिष्ठ के प्रमाण से यह नियम स्वीकृत है कि जब काल-दोष मुख्य दिन को हटा दे, तो विकल्प-दिन सभी के लिए प्रत्येक दोष से मुक्त होना चाहिए। प्रमाणों में जहाँ भी मतभेद है, वह पाठ-विवेचन (भाग ३) में आधार सहित अंकित है।

मुख्य शब्द: उपाकर्म; श्रावणी; आवणि अविट्टम्; निर्णयसिन्धु; धर्मसिन्धु; स्मृतिमुक्ताफल; तिथिनिर्णय; ग्रहण; संक्रान्ति; मौढ्य; काल-दोष; ग्रह-दोष।

परिपाटी

उद्धरण: प्रत्येक श्लोक के बाद उसका स्रोत वक्ता (संकलन-ग्रन्थ, पृष्ठ) के रूप में दिया गया है। भाग १ के पृष्ठ ग्रन्थसूची में दिए संस्करणों के हैं। भाग २ में, जहाँ अंकित है, इस विषय के पूर्व अध्ययन में प्रयुक्त संस्करणों (मराठी धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु का अन्य संस्करण) के पृष्ठ रखे गए हैं; भाग १ में उद्धृत अंश सूचीबद्ध संस्करणों में पुनः सत्यापित हैं।

अनुवाद लेखक का अपना है और संस्कृत के निकट रखा गया है।

संकेत

NS निर्णयसिन्धु · DS धर्मसिन्धु · SMP स्मृतिमुक्ताफल (वर्णाश्रमधर्मकाण्ड) · TN तिथिनिर्णय · SK स्मृतिकौस्तुभ · AG आह्निक ग्रन्थ (श्री अहोबिल मठ) · VPV व्रत-पर्व-विवेक · ĀpGS आपस्तम्ब गृह्यसूत्र।

पद्धति

जहाँ प्रमाण किसी प्रश्न पर बोलते हैं, वहाँ यह क्रम लागू है:

१. स्वसूत्र: उपाकर्म "अपने गृह्य में कहे काल में" होता है (उपाकर्म स्वगृह्योक्ते काले, अत्रि, SMP पृ.१३२)। अतः सूत्र-विशेष वचन अपनी शाखा पर लागू होता है और सामान्य नियम उसे नहीं काटता।

२. स्मृति-वचन (मनु, वसिष्ठ, व्यास, गार्ग्य, बृहस्पति, कश्यप, कात्यायन), जैसे निबन्धों में सुरक्षित हैं।

३. निबन्ध (NS, DS, SMP, TN, SK), जहाँ वे वचनों की व्याख्या और समन्वय करते हैं, शाखा या देश के अनुसार व्यवस्था सहित।

४. जीवित परम्परा (AG), जहाँ ग्रन्थ मौन या विभक्त हैं।

५. सिद्धान्ती का निर्णय, जहाँ प्रमाणों में विरोध बना रहे, आधार सहित। ऐसे सभी निर्णय भाग ३ में सूचीबद्ध हैं।

भाग १: नियम

ये नियम किसी भी वर्ष और किसी भी नगर में उपाकर्म का दिन निश्चित करते हैं। इस साइट के उपाकर्म पृष्ठ इन्हें स्वतः लागू करते हैं; प्रत्येक नियम के साथ उसके श्लोक दिए हैं, और भाग २ में उनकी व्याख्या है।

नियम १. श्रावणी कौन सी पूर्णिमा है

श्रावणी वह पूर्णिमा है जो उस चान्द्र मास के मध्य में आती है जिसका अन्त सिंहस्थ सूर्य में होने वाली अमावस्या से होता है, चाहे उसमें श्रवण नक्षत्र हो या न हो। उपाकर्म चान्द्रमान वर्ष से चलता है।

▶ SMP पृ.१३२, आपस्तम्ब पर

तदेवं सवितरि सिंहस्थे याऽमावास्या तदन्ते चान्द्रमसे मासे या मध्यवर्तिनी पौर्णमासी सा श्रावणी । श्रवणयोगस्तु भवतु वा मा वाभूत् ।

→ सिंहस्थ सूर्य की अमावस्या से समाप्त होने वाले चान्द्र मास के मध्य की पूर्णिमा श्रावणी है, श्रवण हो या न हो।

▶ वैदिक सार्वभौम, गृह्यरत्न (AG §३२, पृ.३५)

सिंहदर्शात् पूर्वा पूर्णिमा श्रावणी । तस्याम् उपाकर्म तैत्तिरीयकाः कुर्युः ।

→ सिंह-अमावस्या से पूर्व की पूर्णिमा श्रावणी है; तैत्तिरीय उस पर उपाकर्म करें।

नियम २. प्रत्येक वेद का मुख्य दिन

यजुर्वेद: श्रावण पूर्णिमा। ऋग्वेद: श्रावण शुक्ल में श्रवण नक्षत्र का दिन। सामवेद: भाद्रपद शुक्ल में हस्त नक्षत्र। अथर्ववेद: श्रावण या भाद्रपद पूर्णिमा।

▶ गोभिल (NS पृ.१५१; SMP पृ.१३५)

पर्वण्यौदयिके कुर्युः श्रावणे तैत्तिरीयकाः । बह्वृचाः श्रवणर्क्षे तु हस्तर्क्षे सामवेदिनः ॥

→ तैत्तिरीय श्रावण के सूर्योदयव्यापी पर्व (पूर्णिमा) पर, ऋग्वेदी श्रवण नक्षत्र पर, सामवेदी हस्त नक्षत्र पर।

▶ तिथिदर्पण (SMP पृ.१३६); पृथ्वीचन्द्र (NS पृ.१४९)

औदयिके सङ्गवस्पर्शे श्रुतौ पर्वणि चार्कभे । कुर्युर्नभस्युपाकर्म ऋग्यजुस्सामगाः क्रमात् ॥

→ संगव को स्पर्श करने वाले सूर्योदयव्यापी दिन पर: ऋक् श्रवण पर, यजुस् पूर्णिमा पर, साम हस्त पर।

नियम ३. जब तिथि या नक्षत्र दो दिनों में हो

यजुर्वेद: पूर्णिमा सूर्योदयव्यापी हो। दूसरे दिन वह तभी मान्य है जब संगव के पार, सूर्योदय से कम से कम ६ मुहूर्त (१२ घटी) रहे; अन्यथा पहला दिन। यही ६ मुहूर्त का नियम प्रत्येक विकल्प-पूर्णिमा पर, भाद्रपद और आषाढ दोनों पर, लागू होता है (DS पृ.९१: "खण्ड तिथि इनके लिए भी पूर्ववत्"; निगम: "श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वा … षण्मुहूर्तकैः"); गुरु पूर्णिमा उत्सव का ३ मुहूर्त का नियम उपाकर्म पर लागू नहीं होता। यदि पूर्णिमा सूर्योदय से १२ से १५ घटी के बीच समाप्त हो, तो उपाकर्म और गायत्री जप एक ही दिन; अन्यथा जप अगले दिन। कुछ आचार्य संगव को केवल स्पर्श करने वाली पूर्णिमा (संगव-स्पृक्) भी मानते हैं; यजुर पृष्ठ पर यह विकल्प के रूप में दिखाया जाता है।

▶ गार्ग्य (NS पृ.१४९; SMP पृ.१३८; AG §३२, पृ.३७)

श्रावणी पौर्णमासी तु सङ्गवात् परतो यदि । तदैवौदयिकी ग्राह्या नान्यदौदयिकी भवेत् ॥

→ श्रावणी पूर्णिमा संगव के पार हो तभी वह औदयिकी और ग्राह्य है; अन्यथा नहीं।

▶ स्मृत्यन्तर (SMP पृ.१३७; AG §३२, पृ.३७-३८)

सन्धिः सङ्गवतः पश्चादर्वाङ्मध्यन्दिनाद्यदि । तत्रैवोपाकृतिं कुर्यात् … सन्धिः सङ्गवतः प्राक् चेत् पूर्वस्मिन् पर्वणि क्रिया । श्वोभूते समिदाधानमेष श्रावणिको विधिः ॥

→ सन्धि संगव के बाद और मध्याह्न से पहले: उपाकर्म उसी दिन। सन्धि संगव से पहले: उपाकर्म पिछले दिन, समिदाधान (गायत्री जप) अगले दिन।

ऋग्वेद: दूसरे दिन श्रवण तभी मान्य जब सूर्योदय के बाद ६ घटी रहे (तब वह धनिष्ठा से युक्त होता है, जो प्रशस्त है); उत्तराषाढ़ा-युक्त श्रवण त्याज्य है।

▶ व्यास, हेमाद्रि द्वारा उद्धृत (NS पृ.१४५)

धनिष्ठासंयुतं कुर्याच्छ्रावणं कर्म यद्भवेत् । … श्रवणेन तु यत्कर्म उत्तराषाढसंयुतम् । संवत्सरकृतोऽध्यायस्तत्क्षणादेव नश्यति ॥

→ धनिष्ठा-युक्त कर्म पूर्ण फल देता है; उत्तराषाढ़ा-युक्त श्रवण में किया कर्म वर्ष भर का अध्ययन तत्काल नष्ट करता है।

सामवेद: अपराह्ण को व्याप्त करने वाला हस्त। दोनों दिन अपराह्ण को पूर्ण या आंशिक स्पर्श: दूसरा दिन। केवल पहले दिन का अपराह्ण: पहला दिन। केवल दूसरे दिन का, या किसी का नहीं: दूसरा दिन।

नियम ४. ग्रहण और संक्रान्ति सभी को रोकते हैं

यदि ग्रहण या संक्रान्ति उस दिन से पहली मध्यरात्रि और उस दिन को समाप्त करने वाली मध्यरात्रि के बीच हो (मध्यरात्रि = सूर्यास्त और अगले सूर्योदय का मध्य), तो उस दिन उपाकर्म नहीं होता, द्वितीय और प्रथम दोनों के लिए, भले ही वह तिथि या नक्षत्र को स्पर्श न करे। ग्रहण प्रथम स्पर्श से गिना जाता है। उपच्छाया (penumbral) ग्रहण धर्मशास्त्र में नहीं माने जाते।

▶ वृद्ध-मनु और कात्यायन (TN पृ.१५; NS पृ.१४६)

अर्धरात्रादधस्ताच्चेत्संक्रान्तिर्ग्रहणं यदा । उपाकर्म न कुर्वीत परतश्चेन्न दोषकृत् ॥

→ मध्यरात्रि से पहले संक्रान्ति या ग्रहण हो तो उपाकर्म न करें; बाद में हो तो दोष नहीं।

▶ हेमाद्रि (NS पृ.१४६)

उपाकर्म न कुर्वन्ति क्रमात्सामर्ग्यजुर्विदः । ग्रहसंक्रान्तियुक्तेषु हस्तश्रवणपर्वसु ॥

→ साम, ऋक् और यजुस् क्रमशः ग्रहण या संक्रान्ति से युक्त हस्त, श्रवण और पर्व पर उपाकर्म नहीं करते।

▶ गार्ग्य, मदनरत्न और हेमाद्रि द्वारा उद्धृत (NS पृ.१४९)

अथ चेद्दोषसंयुक्ते पर्वणि स्यादुपाक्रिया । दुःखशोकामयग्रस्ता राष्ट्रे तस्मिन् द्विजातयः ॥

→ दोष-युक्त पर्व पर उपाकर्म हो तो उस राष्ट्र के द्विज दुःख, शोक और रोग से ग्रस्त होते हैं।

नियम ५. अधिक मास

अधिक मास में उपाकर्म नहीं होता; मास-वृद्धि के वर्ष में वह निज मास में होता है।

▶ ज्योतिः-पराशर (NS पृ.१४८)

उपाकर्म तथोत्सर्गः … मासवृद्धौ परे कार्या वर्जयित्वा तु पैतृकम् ॥

→ उपाकर्म और उत्सर्ग: मास-वृद्धि में बाद वाले (निज) मास में।

नियम ६. गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त केवल प्रथम उपाकर्म को, मुख्य दिन पर, रोकते हैं

प्रथम उपाकर्म (उपनयन के बाद) गुरु या शुक्र के अस्त में नहीं होता। द्वितीय कर्ता अस्त में भी मुख्य दिन पर उपाकर्म करता है।

▶ कश्यप (NS पृ.१४८)

गुरुभार्गवयोर्मौढ्ये बाल्ये वा वार्धकेऽपि वा । तथाधिमाससंसर्पमलमासादिषु द्विजे ॥ प्रथमोपाकृतिर्न स्यात्कृतं कर्म विनाशकृत् ॥

→ गुरु और शुक्र के मौढ्य, बाल्य या वार्धक्य में, और अधिमास, संसर्प, मलमास में प्रथम उपाकर्म न हो; किया जाए तो नाशकारी।

▶ TN पृ.१५

एतच्च शुक्रास्तादावपि कर्तव्यम् । प्रथमारम्भस्तु तत्र न भवति ।

→ उपाकर्म शुक्र-अस्त आदि में भी करना; केवल प्रथम आरम्भ तब नहीं होता।

▶ DS पृ.९२

द्वितीयाद्युपाकर्म त्वस्तादावपि कार्यं । मलमासे तु द्वितीयाद्यपि न कार्यम् ।

→ द्वितीय आदि उपाकर्म अस्त आदि में भी करना; पर मलमास में द्वितीय आदि भी नहीं।

नियम ७. विकल्प-दिन सभी के लिए प्रत्येक दोष से मुक्त हो

जब ग्रहण या संक्रान्ति मुख्य दिन को दूषित कर दे, तो विकल्प-दिन तभी मान्य है जब वह ग्रहण, संक्रान्ति और गुरु-शुक्र-अस्त, तीनों से मुक्त हो, द्वितीय और प्रथम दोनों कर्ताओं के लिए। जिस प्रथम कर्ता के मुख्य दिन पर केवल अस्त हो, वह भी ऐसा शुद्ध विकल्प-दिन ढूँढता है।

▶ वसिष्ठ (SMP पृ.१३८-१३९)

मलमासे निपतिते सूतके मृतकेऽपि वा । ग्रहणे सङ्क्रमे वाऽपि मौढ्येऽपि गुरुशुक्रयोः ॥ प्रौष्ठपद्यामथाषाढ्यामुपाकरणमिष्यते । प्रौष्ठपद्यामुपाकुर्याच्छ्रावणं दूषितं यदि ॥ आषाढे वाऽपि कर्तव्यं प्रौष्ठपद्याश्च दूषणे । मासत्रयेऽपि दोषश्चेत् श्रावण्यामेव कारयेत् ॥

→ मलमास, सूतक या मृतक, ग्रहण या संक्रम, अथवा गुरु-शुक्र के मौढ्य में उपाकर्म प्रौष्ठपदी या आषाढी में: श्रावण दूषित हो तो प्रौष्ठपदी में; प्रौष्ठपदी भी दूषित हो तो आषाढ में; तीनों मासों में दोष हो तो श्रावणी में ही।

नियम ८. वेद और सूत्र के अनुसार विकल्प-क्रम

वेद / सूत्र

क्रम

काण्व, माध्यन्दिन (शुक्ल यजुर्)

श्रावण पूर्णिमा → हस्त-युक्त श्रावण शुक्ल पञ्चमी → भाद्रपद पूर्णिमा → भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी

आपस्तम्ब (कृष्ण यजुर्)

श्रावण पूर्णिमा → भाद्रपद पूर्णिमा → आषाढ पूर्णिमा

बौधायन (कृष्ण यजुर्)

श्रावण पूर्णिमा → भाद्रपद पूर्णिमा → आषाढ पूर्णिमा

हिरण्यकेशी (कृष्ण यजुर्)

श्रावण पूर्णिमा → श्रावण में हस्त → भाद्रपद में हस्त (सूर्योदयव्यापी और संगव-स्पर्शी हस्त, अन्यथा पिछला दिन); पञ्चमी नहीं

ऋग्वेद

श्रवण नक्षत्र → पञ्चमी → हस्त (प्रत्येक सूर्योदय से ६ घटी), श्रावण में, फिर भाद्रपद में वही

सामवेद

भाद्रपद शुक्ल हस्त → श्रावण हस्त → भाद्रपद पञ्चमी → श्रावण पञ्चमी; कर्कस्थ सूर्य वाला श्रावण हस्त केवल अन्तिम उपाय; कुछ आचार्य: श्रावणी पर उपाकर्म, अध्ययन भाद्रपद हस्त तक स्थगित

▶ NS पृ.१५१

श्रावण्यामपि ग्रहणादिदुष्टायां कातीयभिन्नैः प्रौष्ठपद्यां कार्यम् । तैस्तु श्रावणपञ्चम्याम् … आपस्तम्बैराथर्वणैश्च प्रौष्ठपद्याम् ॥ यत्तु बौधायनः 'श्रावण्यां पौर्णमास्यामाषाढ्यां वोपाकृत्य' इत्यूचे, तत् प्रौष्ठपद्यामपि दोषे आषाढ्यां कार्यमित्येवमर्थम् । तच्छाखीयविषयं वा ॥

→ श्रावणी ग्रहण आदि से दूषित हो तो कातीयों को छोड़ सभी प्रौष्ठपदी में करें; कातीय श्रावण पञ्चमी में; आपस्तम्ब और आथर्वण प्रौष्ठपदी में। बौधायन का "श्रावणी या आषाढी" का अर्थ है: प्रौष्ठपदी में भी दोष हो तो आषाढी में; अथवा यह उनकी शाखा-विषयक है।

▶ स्मृतिमहार्णव, हेमाद्रि द्वारा उद्धृत (NS पृ.१५१)

संक्रान्तिर्ग्रहणं वापि पौर्णमास्यां यदा भवेत् । उपाकृतिस्तु पञ्चम्यां कार्या वाजसनेयिभिः ॥

→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति या ग्रहण हो तो वाजसनेयी (काण्व, माध्यन्दिन) पञ्चमी में उपाकर्म करें।

▶ DS पृ.९०-९१

हिरण्यकेशीनां श्रावणी पौर्णमासी मुख्यकालः तदभावे श्रावणहस्तः

→ हिरण्यकेशी: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य काल; वह न हो तो श्रावण में हस्त (श्रावण पञ्चमी उनके सूत्र में नहीं)।

▶ याज्ञवल्क्य (SMP पृ.१३३-१३४)

अध्यायानामुपाकर्म श्रावण्यां श्रवणेन वा । हस्तेनौषधिभावे वा पञ्चम्यां श्रावणस्य तु ॥

→ उपाकर्म श्रावणी पर, या श्रवण पर, या (औषधियों के उगने पर) हस्त-युक्त श्रावण पञ्चमी पर।

नियम ९. जब कोई शुद्ध दिन न हो: शान्ति-सहित मुख्य दिन

क्रम के सभी दिन दूषित हों तो सभी मुख्य दिन पर पहले शान्ति (परिहार) करके उपाकर्म करते हैं। जब अस्त सभी विकल्प-दिनों को ढक ले, तब प्रथम कर्ता पर भी यही लागू है।

▶ व्यास (SMP पृ.१३९)

कालत्रयेऽपि दोषे तु श्रावण्यामेव कारयेत् । पौर्णमास्यास्तु नित्यत्वादापस्तम्बस्य शासनात् ॥

→ तीनों कालों में दोष हो तब भी श्रावणी में ही करें, क्योंकि आपस्तम्ब के शासन से पूर्णिमा नित्य है।

▶ बृहस्पति, व्याख्या सहित (SMP पृ.१४१; AG §३४, पृ.४०-४१)

श्रावणप्रौष्ठपदाषाढेष्वेकस्मिन् दोषरहिते प्रथमोपाकृतिः कर्तव्या । त्रिष्वपि दुष्टेषु श्रावणमासे शान्तिपूर्विका कर्तव्या ॥

→ श्रावण, प्रौष्ठपद और आषाढ में जो दोष-रहित हो उसमें प्रथम उपाकर्म; तीनों दूषित हों तो श्रावण में, पहले शान्ति करके।

शान्ति-मन्त्र (पद्धति, SMP पृ.१४२): गुरु-अस्त: बृहस्पते अति यद्; शुक्र-अस्त: प्र वः शुक्राय; मलमास: आप्यायस्व; सूर्य-ग्रहण और संक्रान्ति: चित्रं देवानाम्, उदु त्यं जातवेदसम्, सूर्यो देवीमुषसम्, उद्वयं तमसस्परि, आ सत्येन, देवो वः सविता उत्पुनातु; चन्द्र-ग्रहण: सोमो धेनुम् से छः मन्त्र, और नवो नवः। पहले शान्ति-होम, फिर उपाकर्म-होम।

नियम १०. दिन का काल

दिन का निर्णय पूर्वाह्ण से होता है। ऋक् और यजुस् के लिए तिथि या नक्षत्र उस दिन के पूर्वाह्ण (सूर्योदय से संगव तक, नियम ३) को व्याप्त करे; सामवेदियों के लिए अपराह्ण दिन का निर्णय करता है (अपराह्ण-व्यापी हस्त, नियम ३)।

उस दिन पहले पूर्वाह्ण में उत्सर्जन, उसका होम और सम्बद्ध कर्म होते हैं; उपाकर्म स्वयं अपराह्ण में होता है। दोनों में दर्भमय ऋषि बनाकर उनकी पूजा होती है।

▶ TN पृ.१६

एतच्च सामगैरपराह्णे कार्यम् । इतरैः पूर्वाह्णे ।

→ सामगों के लिए अपराह्ण, अन्यों के लिए पूर्वाह्ण: वह काल जिससे दिन निश्चित होता है।

▶ प्रचेता (NS पृ.१४८)

भवेदुपाकृतिः पौर्णमास्यां पूर्वाह्ण एव तु ।

→ उपाकर्म की पूर्णिमा वह है जो पूर्वाह्ण में विद्यमान हो।

दिन का निर्णय पूर्वाह्ण से, पर उपाकर्म अपराह्ण में क्यों

उपाकर्म एक अकेला कर्म नहीं, पूरे दिन के कर्मों की परिणति है। दिन का कर्म पूर्वाह्ण में आरम्भ होता है, इसलिए दिन उस तिथि या नक्षत्र से चुना जाता है जो पूर्वाह्ण को व्याप्त करे। फिर प्रातःकाल क्रम से शास्त्रोक्त पूर्व-कर्मों में लगता है:

• स्नान और दिन का नित्यकर्म;

• पिछले अध्ययन-काल का उत्सर्जन, उसके होम सहित (SMP पृ.१३५; NS पृ.१५३);

• दर्भमय ऋषियों का निर्माण और पूजन (कार्ष्णाजिनि, NS पृ.१५३; SMP पृ.१३५);

• तैत्तिरीयों द्वारा प्रजापति आदि देवताओं को तिलोदक से तीन-तीन बार तर्पण (कपर्दी, SMP पृ.१४६);

• मन्त्र सहित नया यज्ञोपवीत, मेखला और वस्त्र धारण (भरद्वाज, शाण्डिल्य, स्मृतिसार, SMP पृ.१४४-१४६), और ब्रह्मचारियों का वपन (SMP पृ.१४६);

• जहाँ दोष हो वहाँ उपाकर्म-होम से पहले शान्ति-होम (पद्धति, SMP पृ.१४२)।

इन सबके बाद ही उपाकर्म स्वयं, अर्थात् उपाकरण-होम और वेदपाठ का पुनरारम्भ, अपराह्ण में होता है। पूर्वाह्ण निश्चित करता है कौन सा दिन; अपराह्ण बताता है उस दिन उपाकर्म तक कब पहुँचा जाता है।

▶ SMP पृ.१३५

अध्यायानामुपाकर्म कुर्यात्कालेऽपराह्णिके । पूर्वाह्णे तु विसर्गः स्यादिति वेदविदो विदुः ॥ उपाकर्मणि चोत्सर्गे यथाकालं समेत्य च । ऋषीन् दर्भमयान् कृत्वा पूजयेत्तान् द्विजस्ततः ॥

→ वेदाध्ययन का उपाकर्म अपराह्ण में; विसर्ग (उत्सर्जन) पूर्वाह्ण में, ऐसा वेदज्ञ जानते हैं। उपाकर्म और उत्सर्ग में यथाकाल एकत्र होकर द्विज दर्भमय ऋषि बनाकर उनकी पूजा करे।

▶ गोभिल, छन्दोगों के लिए (SMP पृ.१३५)

छन्दोगाभिहिताः कुर्युः प्रातरुत्सर्गिकीं क्रियाम् । अपराह्णेऽप्युपाकर्म पुष्यहस्तर्क्षयोर्द्विजाः ॥

→ प्रातः उत्सर्ग-कर्म; अपराह्ण में उपाकर्म, क्रमशः पुष्य और हस्त पर।

नियम ११. नर्मदा और कर्कस्थ सूर्य

ग्रन्थ नर्मदा के उत्तर में कर्कस्थ सूर्य में उपाकर्म को सीमित करते हैं और दक्षिण में अनुमति देते हैं; निर्णयसिन्धु सिंह-नियम को सामगों तक सीमित करता है। भारत के बाहर यह कुलाचार का विषय है, स्थान का नहीं, और गणना-पृष्ठ इसे नगर के आधार पर लागू नहीं करते।

▶ गर्ग और बृहस्पति (SMP पृ.१४०; NS पृ.१४७)

कुलीरे रविसंयुक्ते उपाकुर्यात्तु दक्षिणे । नर्मदोत्तरदेशे तु कर्तव्यं सिंहयुक्तके ॥

→ कुलीर (कर्क) में सूर्य हो तो दक्षिण में उपाकर्म करें; नर्मदा के उत्तर में सिंहस्थ सूर्य में।

भाग २: व्याख्या

उद्धृत प्रमाण

प्रमाण

प्रकार

पृष्ठ

निर्णयसिन्धु (कमलाकर भट्ट), भाषाटीका सहित

निबन्ध

पृ.१४५-१५३ (उपाकर्म-निर्णय)

धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), हिन्दुस्तानी भाषान्तर सहित

निबन्ध

पृ.८९-९४

स्मृतिमुक्ताफल (वैद्यनाथ दीक्षित), वर्णाश्रमधर्मकाण्ड

निबन्ध

पृ.१३२-१४७

तिथिनिर्णय (भट्टोजि दीक्षित)

निर्णय

पृ.१५-१६

स्मृतिकौस्तुभ (अनन्तदेव)

निबन्ध

पृ.१५३-१६१

आह्निक ग्रन्थ, भाग २ (श्री अहोबिल मठ)

जीवित परम्परा

§३१-३५

आपस्तम्ब गृह्यसूत्र (प्रश्न ७), हरदत्त सहित

प्राथमिक सूत्र

-

अध्याय २-अ: सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण

क्या ग्रहण होने पर भी द्वितीय उपाकर्म श्रावण पूर्णिमा को हो सकता है?

⚠ संक्षिप्त उत्तर: नहीं: ग्रहण प्रथम और द्वितीय दोनों उपाकर्मों को रोकता है।

यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यावहारिक निर्णय है।

बहुत से लोग गलती से मानते हैं कि चूँकि गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त द्वितीय उपाकर्म में अनुमत हैं,

इसलिए ग्रहण भी द्वितीय को नहीं रोकेगा। यह गलत है। ग्रहण बिल्कुल अलग श्रेणी का दोष है।

निर्णायक भेद: ग्रह-दोष बनाम काल-दोष

उपाकर्म-निर्णय में दो मौलिक रूप से भिन्न प्रकार के दोष हैं:

प्रकार

क्या है

प्रथम

द्वितीय

उदाहरण

ग्रह-दोष

ग्रह की स्थिति-आधारित अशुद्धि (ग्रह अस्त/कमज़ोर है)

❌ वर्जित

✅ अनुमत

गुरु-अस्त, शुक्र-अस्त

काल-दोष

काल-आधारित अशुद्धि (समय की अवधि ही अशुद्ध है)

❌ वर्जित

❌ वर्जित

ग्रहण, संक्रान्ति, अधिकमास

पयोगपारिजात का 'ग्रहवेधो न विद्यते': यह केवल ग्रह-वेध (ग्रह की बाधा) पर लागू होता है। यह काल-दोष जैसे ग्रहण और संक्रान्ति पर लागू नहीं होता।

प्रमाण: ग्रहण द्वितीय को भी क्यों रोकता है

प्रमाण १: धर्मसिन्धु (पृ.१०८): प्रथम/द्वितीय का कोई भेद नहीं

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी): सर्वशाखीय, कोई विशेषण नहीं

सर्वशाखीयांच्या गृह्यसूत्रांत उपाकर्माचा जो मुख्य दिवस सांगितला, त्या दिवशीं जर ग्रहण अथवा संक्रांति असेल, तर संक्रांतिरहित असे पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।

→ सभी शाखाओं के लिए: मुख्य दिन पर ग्रहण या संक्रान्ति हो: संक्रान्ति-रहित पञ्चमी आदि लें।

महत्वपूर्ण बिन्दु: 'सर्वशाखीयांच्या' (सभी शाखाओं के लिए) शब्द और प्रथम/द्वितीय का कोई भी भेद न होना: यह सिद्ध करता है कि ग्रहण सभी उपाकर्मों को समान रूप से रोकता है।

प्रमाण २: गार्ग्य (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३): 'न कर्तव्यम्': प्रथम/द्वितीय का कोई विशेषण नहीं

▶ गार्ग्य (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३ + निर्णयसिन्धु पृ.१७१)

अर्धरात्रादधस्ताच्चेत्संक्रान्त्यां ग्रहणेऽपि वा । न कर्तव्यमुपाकर्मं परतश्चेन्न दोषकृत् ।

→ पिछली वैदिक मध्यरात्रि और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच ग्रहण या संक्रान्ति हो: उपाकर्म न करें (न कर्तव्यम्); अगले उचित काल में करें। अगली वैदिक मध्यरात्रि के बाद हो तो दोष नहीं (परतश्चेन्न दोषकृत्)।

'न कर्तव्यमुपाकर्मम्': उपाकर्म नहीं करना चाहिए। प्रथम या द्वितीय का कोई विशेषण नहीं: निषेध दोनों पर समान है। इसकी एकमात्र शर्त काल की है: पिछली और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच।

प्रमाण ३: स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६): ग्रह-वेध और काल-दोष स्पष्टतः अलग

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६), मदनरत्न

नित्ये नैमित्तिके जप्ये होमे यज्ञक्रियासु च । उपाकर्मणि चोत्सर्गे ग्रहवेधो न विद्यते ।

→ नित्य, नैमित्तिक, उपाकर्म, उत्सर्जन: इनमें ग्रह-वेध नहीं लगता।

स्मृतिकौस्तुभ इसके तुरन्त बाद (उसी पृ.१५६ पर) ग्रहण का नियम देता है:

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६): उसी पृष्ठ पर, तुरन्त बाद

बहूचाः श्रवणे कुर्यूर्ग्रहसंक्रान्तिवर्जिते

→ बहूच श्रवण में करें: ग्रहण और संक्रान्ति से वर्जित [दिन में]।

यह क्रम जानबूझकर शिक्षाप्रद है: ग्रह-वेध अपवाद → तुरन्त ग्रहण-निषेध। स्मृतिकौस्तुभ स्वयं इन दोनों श्रेणियों को एक ही पृष्ठ पर अलग करता है।

स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६) एक परिमार्जन भी देता है:

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६): एकमात्र सम्भव लचीलापन

तथातीतार्धरात्रात्परं विद्यमानो दूषको न तत्तूषः

→ जो ग्रहण/संक्रान्ति मध्यरात्रि के बाद समाप्त (अतीत) हो चुकी हो: वह दोषक नहीं।

यही एकमात्र लचीलापन है जो स्मृतिकौस्तुभ देता है: और यह भी प्रथम और द्वितीय दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जो ग्रहण मध्यरात्रि की खिड़की में सक्रिय है: दोनों अवरुद्ध हैं।

प्रमाण ४: स्मृतिमहार्णव (निर्णयसिन्धु पृ.१७१ + स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५५)

▶ स्मृतिमहार्णव

संक्रान्तिग्रहणञ्चापि यदि पर्वणि जायते । तन्मासे हस्तयुक्तायां पञ्चम्यां वा तदिष्यते ।

→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति या ग्रहण हो: उस मास में हस्त-पञ्चमी लें।

'यदा भवेत्': जब भी हो। प्रथम-कर्ताओं तक सीमित नहीं। द्वितीय कर्ताओं पर भी समान रूप से लागू।

भ्रम का कारण: लोग द्वितीय को क्यों मुक्त मानते हैं

लोग इन दो वैध कथनों को मिला देते हैं:

• सत्य: 'गुरु-अस्त/शुक्र-अस्त द्वितीय उपाकर्म को नहीं रोकते': यह सच है, क्योंकि ये ग्रह-दोष हैं

• असत्य: 'इसलिए ग्रहण भी द्वितीय को नहीं रोकेगा': यह गलत है, क्योंकि ग्रहण काल-दोष है

नित्यकर्म-अपवाद ('ग्रहवेधो न विद्यते') विशेष रूप से ग्रह-वेध के बारे में है: ज्योतिष की वह अवधारणा जिसमें एक ग्रह 'बाधित' या 'पीड़ित' होता है। ग्रहण ग्रह-वेध नहीं है। ग्रहण एक वास्तविक खगोलीय घटना है जो समय की अवधि को ही अशुद्ध बनाती है।

सम्पूर्ण दोष-तालिका

दोष

प्रकार

प्रथम

द्वितीय

द्वितीय निर्णय का आधार

ग्रहण

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित (शान्ति के बिना)

धर्मसिन्धु पृ.१०८: सर्वशाखीय: कोई प्रथम/द्वितीय भेद नहीं गार्ग्य: 'न कर्तव्यम्' (पिछली और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच) स्मृतिकौस्तुभ: 'ग्रहसंक्रान्तिवर्जिते'

संक्रान्ति

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

ग्रहण के समान: सभी समान प्रमाण

अधिकमास

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

धर्मसिन्धु पृ.९३; निर्णयसिन्धु पृ.१७२: दोनों स्पष्ट

गुरु-अस्त

ग्रह-दोष

❌ वर्जित

✅ अनुमत (ग्रह-वेध अपवाद)

पयोगपारिजात: 'ग्रहवेधो न विद्यते' स्मृतिमुक्ताफले: 'गुरुशुक्रयोः कर्तव्यम्'

शुक्र-अस्त

ग्रह-दोष

❌ वर्जित

✅ अनुमत (ग्रह-वेध अपवाद)

तिथिनिर्णयम्: 'शुक्रास्तादावपि कर्तव्यम्' स्मृतिकौस्तुभ: 'वस्तातादावपि कार्यम्'

काल-त्रय दोष

आपद्धर्म

→ श्रावणी+शान्ति

→ श्रावणी+शान्ति

व्यास; बृहस्पति: द्वितीय अपवाद नहीं

एक पंक्ति में सारांश: ग्रह-दोष (ग्रह-दहन) → द्वितीय में अपवाद। काल-दोष (ग्रहण, संक्रान्ति, अधिकमास) → द्वितीय में भी नहीं। छः प्राथमिक प्रमाणों में से किसी में भी कोई अपवाद नहीं।

पण्डित महेश शास्त्रीजी

Mypanchang.com

DS=Dharmasindhu | NS=Nirṇaya-Sindhu | TD=Tithinirṇayam | SMF=Smṛtimuktāphale | SK=Smṛti-Kaustubha

अध्याय १: उपाकर्म का स्वरूप

१.१ परिभाषा और सर्वोच्च सिद्धान्त

उपाकर्म कोई उत्सव नहीं: यह वेदाध्याय-पुनरारम्भ है। स्मृति परिभाषा:

उपाकर्म नाम वेदाध्ययनस्य पुनरारम्भः

upākarma nāma vedādhyayanasya punarārambhaḥ

अर्थ: उपाकर्म वेदाध्ययन का पुनरारम्भ है।

न कदाचिद् उपाकर्म लोपः

na kadācid upākarma lopaḥ

अर्थ: उपाकर्म का लोप कभी नहीं होना चाहिए।

१.२ उपाकर्म नित्यकर्म है: निर्णायक वर्गीकरण

सभी छः प्रमाण उपाकर्म को नित्यकर्म मानते हैं। इसका महत्वपूर्ण परिणाम: पयोगपारिजात का वचन:

▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१७२) + स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६), पयोगपारिजात/मदनरत्न से उद्धृत

नित्ये नैमित्तिके जप्ये होमे यज्ञक्रियासु च । उपाकर्मणि चोत्सर्गे ग्रहवेधो न विद्यते ।

→ नित्य, नैमित्तिक, जप, होम, यज्ञ, उपाकर्म और उत्सर्जन में: ग्रहवेध नहीं लगता।

अतः: गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त = ग्रह-दोष: और नित्यकर्म ग्रहवेध से मुक्त है: इसीलिए ये केवल प्रथम उपाकर्म पर लागू होते हैं। इसके विपरीत, ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष: ये नित्यकर्म पर भी लागू होते हैं।

१.३ शाखा-भेद

शाखा

मुख्य तिथि

प्रथम विकल्प

द्वितीय विकल्प

आपस्तम्ब (कृष्ण यजुर्)

श्रावणी पूर्णिमा

भाद्रपद पूर्णिमा

-

बौधायन (कृष्ण यजुर्)

श्रावणी पूर्णिमा

आषाढ पूर्णिमा

-

हिरण्यकेशी (कृष्ण यजुर्)

श्रावणी पूर्णिमा

श्रावण में हस्त, फिर भाद्रपद में हस्त

-

काण्व / माध्यन्दिन (शुक्ल यजुर्)

श्रवण+पूर्णिमा या हस्त+पञ्चमी

भाद्रपद पूर्णिमा, फिर भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी

-

ऋग्वेद (आश्वलायन/शाकल)

श्रावण श्रवण-नक्षत्र

पञ्चमी

हस्त

सामवेद

भाद्रपद शुक्ल हस्त

श्रावण हस्त

कन्या-मास हस्त*

अथर्ववेद (शौनक)

श्रावण या भाद्रपद पूर्णिमा

-

-

* कन्या-मास विकल्प: स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३३): यदि सिंह-भाद्रपद की मुख्य तिथियाँ बाधित हों → कन्या-मास अपरपक्ष हस्त नक्षत्र।

अध्याय २: दोष-क्रम: कौन सा दोष किस उपाकर्म को रोकता है?

यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सर्वाधिक गलत समझा जाने वाला विषय है। सभी छः प्रमाण एक समान भेद स्थापित करते हैं।

२.१ श्रेणी अ: केवल प्रथम उपाकर्म को रोकने वाले दोष

धर्मसिन्धु (पृ.९३), निर्णयसिन्धु (पृ.१७२-७३), तिथिनिर्णयम्, स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३४) और स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५९): सभी एकमत हैं:

▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)

नवीन यज्ञोपवीतसंस्कारवालोंका प्रथम उपाकर्म बृहस्पति और शुक्रके अस्त आदिमें और अधिकमास आदिमें और सिंहके सूर्यमें नहीं करना।

→ नवीन यज्ञोपवीत-संस्कारवालों का प्रथम उपाकर्म गुरु-अस्त, शुक्र-अस्त, अधिकमास और सिंहस्थ-सूर्य में नहीं करना।

▶ नारायणवृत्ति (निर्णयसिन्धु पृ.१७२-७३ में उद्धृत)

प्रथमोपाकृतने स्यात्कृतं कर्म विनाशकृत्

→ इन निषिद्ध कालों में प्रथम उपाकर्म करने पर: किया गया कर्म नष्ट हो जाता है।

▶ स्मृतिमुक्ताफले (पृ.३४), स्मृतिसार-समुच्चय

यज्ञोपवीतं कर्तव्यं श्रावणे गुरुशुक्रयोः । मौढ्येऽपि वार्धक्ये बाल्ये नित्यकर्मवन्नोदितम् ।

→ श्रावण में गुरु-शुक्र (अस्त/मौढ्य) में भी यज्ञोपवीत (उपाकर्म) कर्तव्य है। मौढ्य, वार्धक्य, बाल्य: नित्यकर्म के रूप में इसका विधान है।

कारण: प्रथम उपाकर्म में संस्कार-अंश होता है (नवीन सूत्रधारी का दीक्षा-संस्कार)। संस्कारकर्म पर कठोरतर शुद्धि-अपेक्षाएँ होती हैं।

२.२ श्रेणी ब: द्वितीय और आगे के उपाकर्मों में अनुमत

सभी छः प्रमाण द्वितीय और परवर्ती उपाकर्मों में ग्रह-दोष की अनुमति देते हैं:

▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)

दूसरा आदि उपाकर्म तौ बृहस्पति और शुक्रके अस्त आदिमें भी करना; परंतु अधिकमासमें नहीं करना।

→ द्वितीय और आगे के उपाकर्म गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त में भी करें; परन्तु अधिकमास में नहीं।

▶ तिथिनिर्णयम् (भट्टोजी दीक्षित)

एतच्छुक्रास्तादावपि कर्तव्यम् । प्रथमारम्भस्तु तत्र न भवेत् ।

→ यह (उपाकर्म) शुक्र-अस्त में भी करना [द्वितीय के लिए]। परन्तु प्रथमारम्भ वहाँ नहीं।

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५९)

द्वितीयाऽपाकर्मे वस्तातादावपि कार्यम्

→ द्वितीय उपाकर्म [गुरु-शुक्र-अस्त] आदि में भी करना।

▶ आत्रेयी दर्शन (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४)

आत्रेये दर्शनात् शुके शक्तियुते गुरुमौढ्येऽपि यजुशासोपाकर्मं कर्तव्यम्

→ आत्रेयी मत से: गुरु-मौढ्य में भी: शुक्र शक्तिमान हो तो: यजुर्वेद उपाकर्म कर्तव्य है।

इस छूट की सीमा: विकल्प-दिन

ये अनुमतियाँ द्वितीय कर्ता को अस्त होने पर भी श्रावण पूर्णिमा स्वयं रखने देती हैं। पर कोई भी यह नहीं कहती कि जब ग्रहण या संक्रान्ति श्रावण पूर्णिमा को पहले ही दूषित कर चुके हों और विकल्प-दिन चुना जा रहा हो, तब क्या हो। जो विकल्प-क्रम उपलब्ध हैं (बृहस्पति, आह्निक-निर्णय) वे प्रथम उपाकर्म के लिए कहे गए हैं। वसिष्ठ इसका निर्णय करते हैं (नियम ७): वे मौढ्य को ग्रहण, संक्रम और मलमास के साथ मास को दूषित करने वाले दोष के रूप में गिनाते हैं, प्रत्येक विकल्प-मास को उसी सूची से परखते हैं, और प्रथम-द्वितीय का कोई भेद नहीं करते।

▶ स्मृतिमुक्ताफल, सार्वभौम और आत्रेय (पृ.१४२-१४३)

यत्तु 'यज्ञोपवीतं कर्तव्यं श्रावणे गुरुशुक्रयोः । बाल्ये मौढ्येऽपि वार्धक्ये कर्तव्यं नित्यकर्मवत्' इत्यादि, तच्छाखाधीशस्य प्राबल्ये सति वेदितव्यम् ॥

ऋग्यजुस्सामाथर्वेशा जीवशुक्रकुजेन्दुजाः । शाखाधीशे शक्तियुक्ते तच्छाखाध्ययनं शुभम् ॥ … मौढ्यादिदोषेषूपाकरणवर्जनस्मरणं स्वशाखाधीशस्य शक्त्यभावविषयम् ॥

→ द्वितीय कर्ता की अस्त-छूट भी तभी है जब शाखाधीश बलवान हो (ऋक् के गुरु, यजुस् के शुक्र, साम के कुज, अथर्व के बुध); मौढ्य में उपाकर्म-निषेध दुर्बल शाखाधीश के विषय में है। अतः यह छूट सर्वव्यापी नियम नहीं है और विकल्प-दिनों तक नहीं जाती।

२.३ श्रेणी स: सभी उपाकर्मों को रोकने वाले दोष (प्रथम और द्वितीय दोनों)

ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष। सभी छः प्रमाण बिना किसी भेद के इन्हें सार्वभौम निषेध घोषित करते हैं:

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी): सर्वशाखीय नियम

सर्वशाखीयांच्या गृह्यसूत्रांत उपाकर्माचा जो मुख्य दिवस सांगितला, त्या दिवशीं जर ग्रहण अथवा संक्रांति असेल, तर संक्रांतिरहित असे पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।

→ सभी शाखाओं के लिए: मुख्य उपाकर्म-दिन पर ग्रहण या संक्रान्ति हो: तो संक्रान्ति-रहित पञ्चमी आदि काल लें।

▶ स्मृतिमहार्णव (निर्णयसिन्धु पृ.१७१ + स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५५ में उद्धृत)

संक्रान्तिग्रहणञ्चापि यदि पर्वणि जायते । तन्मासे हस्तयुक्तायां पञ्चम्यां वा तदिष्यते ।

→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति या ग्रहण हो: उस मास में हस्त-पञ्चमी लें।

▶ पाण्डुती (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३): आपस्तम्ब-विशेष

ग्रहणे संक्रमे वाऽपि मौढ्येऽपि गुरुशुक्रयोः । प्रौष्ठपद्यामथाशुच्या उपाकरणमिष्यते ।

→ श्रावण में ग्रहण, संक्रान्ति, या गुरु-शुक्र-मौढ्य हो: भाद्रपद (प्रौष्ठपदी) में उपाकर्म करें।

२.४ श्रेणी द: काल-त्रय नियम (तीनों मास दूषित हों)

जब आषाढ, श्रावण और भाद्रपद: तीनों एक साथ दूषित हों, तब:

▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)

कालत्रयेऽपि दोषे तु श्रावण्यामेव कारयेत् । पौर्णमास्यास्तु नित्यत्वादापस्तम्बस्य शासनात् ।

→ तीनों कालों में दोष होने पर भी: श्रावणी में ही करें। क्योंकि आपस्तम्ब के शासन से पूर्णिमा नित्य है।

▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)

मुक्त्वा भाद्रपदाषाढ्यां श्रावण्यामेव कारयेत्

→ भाद्रपद और आषाढ को छोड़कर: श्रावणी में ही करें।

▶ बृहस्पति (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४): शान्ति-पूर्वक

श्रावण-प्रौष्ठपदाषाढेषु एकस्मिन्दोषरहिते प्रथमोपाकृतिः कर्तव्या । त्रिष्वपि दुष्टेषु श्रावणमासे शान्तिपूर्विका कर्तव्या ।

→ यदि आषाढ, श्रावण, भाद्रपद में से एक दोषरहित हो: वहाँ उपाकर्म करें। यदि तीनों दूषित हों: श्रावण मास में शान्ति-पूर्वक करें।

अहोबिल-मठ नियम का मूल स्रोत: यह बृहस्पति-वचन है, जो स्मृतिमुक्ताफले में व्यास के काल-त्रय वचन के साथ उद्धृत है। अहोबिल-मठ का आह्निक-निर्णय इन्हीं प्रमाणों पर आधारित है।

२.५ सम्पूर्ण दोष-तालिका

दोष

श्रेणी

प्रथम उपाकर्म

द्वितीय आगे

प्रमाण

ग्रहण (Eclipse)

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

सर्वशाखीय: सभी छः प्रमाण

संक्रान्ति

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

सर्वशाखीय: सभी छः प्रमाण

अधिकमास

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

धर्मसिन्धु, स्मृतिकौस्तुभ: स्पष्ट

गुरु-अस्त

ग्रह-दोष

❌ वर्जित

✅ अनुमत

धर्मसिन्धु पृ.९३; स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४

शुक्र-अस्त

ग्रह-दोष

❌ वर्जित

✅ अनुमत

तिथिनिर्णयम्: 'शुक्रास्तादावपि'; स्मृतिकौस्तुभ

सिंहस्थ-सूर्य: सामवेद

काल-दोष

❌ वर्जित

❌ वर्जित

निर्णयसिन्धु पृ.१७२: केवल सामगानाम्

सिंहस्थ-सूर्य: अन्य शाखाएँ

लागू नहीं

लागू नहीं

लागू नहीं

निर्णयसिन्धु: 'न तु बहूचादिपरम्'

काल-त्रय दोष

आपद्धर्म

→ श्रावणी+शान्ति

→ श्रावणी+शान्ति

व्यास; बृहस्पति; स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३-३४

अध्याय ३: ग्रहण-दोष की सटीक परिभाषा

३.१ अष्ट-प्रहर की खिड़की: धर्मसिन्धु

▶ धर्मसिन्धु (पृ.९३)

ग्रहण और संक्रांति का योग उपाकर्मसंबंधी दिनरात्रिमें होवै अर्थात् मध्यरात्रके पहले दो प्रहर और व्यतीत हुये मध्यरात्रके उपरंत दो प्रहर होता है: आठ प्रहरमें विद्यमान और श्रवणनक्षत्रकी पूर्णिमा आदि तिथिसें नहीं स्पर्शत हुआ ऐसाभी ग्रहण और संक्रांतिका योग उपाकर्मकों दूषित करता है।

→ मध्यरात्रि से पहले दो प्रहर और मध्यरात्रि के बाद दो प्रहर = आठ प्रहर की खिड़की। यदि ग्रहण या संक्रान्ति का स्पर्श श्रवण-नक्षत्र या पूर्णिमा-तिथि से न भी हो: तब भी उपाकर्म दूषित होता है।

एक प्रहर ≈ ३ घण्टे। अतः यह खिड़की लगभग सायं ६ बजे से प्रातः ६ बजे तक है: पूरी रात।

३.२ अर्धरात्रि-सूत्र: तीन प्रमाण

▶ पयोगपारिजात (निर्णयसिन्धु पृ.१७१ में)

अर्धरात्रादधस्ताच्चेत्संक्रान्तिग्रहणं तदा । उपाकर्म न कुर्वीत परतश्चेन्न दोषकृत् ।

→ पिछली और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच ग्रहण/संक्रान्ति हो: उपाकर्म न करें। अगली वैदिक मध्यरात्रि के बाद हो तो दोष नहीं।

▶ गार्ग्य (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३ + निर्णयसिन्धु पृ.१७१)

अर्धरात्रादधस्ताच्चेत्संक्रान्त्यां ग्रहणेऽपि वा । न कर्तव्यमुपाकर्मं परतश्चेन्न दोषकृत् ।

→ पिछली और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच ग्रहण/संक्रान्ति हो: उपाकर्म नहीं; अगले उचित काल में करें। अगली वैदिक मध्यरात्रि के बाद: दोष नहीं।

▶ मदनरत्न/गार्ग्य (निर्णयसिन्धु पृ.१७१)

यद्यर्धरात्रादर्वाक् तु ग्रहः संक्रम एव च । नोपाकर्म तदा कुर्याच्छ्रावण्यां श्रवणेऽपि वा ॥

→ अगली वैदिक मध्यरात्रि से पहले ग्रहण या संक्रान्ति: श्रावणी या श्रवण-नक्षत्र दिन में भी उपाकर्म नहीं।

३.३ स्मृतिकौस्तुभ का परिमार्जन: अतीत दोष

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५६)

तथातीतार्धरात्रात्परं विद्यमानो दूषको न तत्तूषः

→ जो ग्रहण/संक्रान्ति मध्यरात्रि के बाद समाप्त (अतीत) हो चुकी हो: वह दोषक नहीं है।

स्मृतिकौस्तुभ का सूक्ष्म भेद: (क) पिछली और अगली वैदिक मध्यरात्रि के बीच ग्रहण/संक्रान्ति → दोष; अगली वैदिक मध्यरात्रि के बाद → दोष नहीं (गार्ग्य व पयोगपारिजात: परतश्चेन्न दोषकृत्)। (ख) स्मृतिकौस्तुभ जोड़ता है: मध्यरात्रि से पहले प्रारम्भ होकर मध्यरात्रि के बाद समाप्त (अतीत) → दोष नहीं।

३.४ हेमाद्रि का अपवाद और उसकी सीमा

▶ निर्णयसिन्धु, प्रयोगपारिजात और हेमाद्रि (पृ.१४७)

नित्ये नैमित्तिके जप्ये होमे यज्ञक्रियासु च । उपाकर्मणि चोत्सर्गे ग्रहवेधो न विद्यते ॥ पर्वणि ग्रहणे सति पूर्वं त्रिरात्रादिवेधाभावं वक्तुमिदम् । तेन पर्वणि ग्रहणेऽपि चतुर्दश्यां श्रवणे कार्यमिति हेमाद्रिः ॥

→ ग्रहण से पूर्व तीन रात्रियों का वेध उपाकर्म पर लागू नहीं; अतः हेमाद्रि कहते हैं कि पूर्णिमा पर ग्रहण होने पर भी श्रवण-युक्त चतुर्दशी पर उपाकर्म हो सकता है।

यह छूट ग्रहण से पहले के दिनों के विषय में है। यह गार्ग्य का नियम (३.२) नहीं हटाती: दिन की अपनी मध्यरात्रि-खिड़की में ग्रहण या संक्रान्ति हो तो वह दिन वर्जित ही है।

अध्याय ४: भौगोलिक नियम: नर्मदा

चार स्वतंत्र प्रमाण एक भौगोलिक नियम स्थापित करते हैं:

▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१६९-७१), पयोगपारिजात (बृहस्पति-वचन)

नर्मदोत्तरभागे तु कर्तव्यं सिंहयुक्ते । कर्कटे संस्थिते भानौ उपाकल्यां दक्षिणेति वचनात् ।

→ नर्मदा के उत्तर में: सिंहस्थ सूर्य में उपाकर्म करें। दक्षिण में: कर्कटस्थ सूर्य में।

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८, मराठी), कौस्तुभ से

नर्मदेच्या उत्तरेकडे सिंहस्थ रवि असतां, पंचमी वगैरे काळ घ्यावेत।

→ नर्मदा के उत्तर में सिंहस्थ सूर्य होने पर पञ्चमी आदि काल लें।

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५८)

नर्मदोत्तर देशे तु कर्तव्यं सिंहयुक्के । कर्कटे संस्थिते भानावुपाकल्यां तु दक्षिणे ।

→ नर्मदा-उत्तर: सिंहस्थ। दक्षिण: कर्कटस्थ।

स्मृतिमुक्ताफल बताता है कि दाक्षिणात्य कौन हैं: आन्ध्रमहाराष्ट्रकर्णाटककायस्था दाक्षिणात्याः । तद्व्यतिरिक्तास्सर्वे नर्मदोत्तरदेशस्था इत्यभियुक्तवादः ॥ (आन्ध्र, महाराष्ट्र, कर्णाटक और कायस्थ दाक्षिणात्य हैं; शेष सभी नर्मदा के उत्तर के माने जाते हैं)। यह नियम समुदायों और उनकी रीति का है, निवास-स्थान का नहीं। भारत के बाहर इसका पालन कुलाचार के रूप में होता है, जैसा स्मृत्यर्थसार कहता है: यथा स्वकुलाचारम्; यह साइट इसे स्थान के आधार पर लागू नहीं करती।

महत्वपूर्ण: सिंहस्थ-सूर्य का निषेध केवल सामगानाम् के लिए है (निर्णयसिन्धु पृ.१७२)। अन्य सभी शाखाओं के लिए सिंहस्थ सूर्य नर्मदा-उत्तर क्षेत्र में उचित समय है: निषेध नहीं।

अध्याय ५: शाखा-विशेष विकल्प-क्रम

५.१ आपस्तम्ब: भाद्रपद, फिर आषाढ

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८)

आपस्तम्बानां श्रावणी पौर्णमासी मुख्या: यत्दभावे भाद्रपदे इति विशेषः

→ आपस्तम्ब: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य। यदि न हो: भाद्रपद। यह विशेष नियम है।

▶ पाण्डुती (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)

प्रौष्ठपद्यामुपाकुर्याच्छ्रावणं दूषितं यदि । आषाढे वाऽपि कर्तव्यं प्रौष्ठपद्यां च दूषिते ।

→ श्रावण दूषित → भाद्रपद। भाद्रपद भी दूषित → आषाढ।

▶ व्यास (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३३)

कालत्रयेऽपि दोषे तु श्रावण्यामेव कारयेत्: पौर्णमास्यास्तु नित्यत्वादापस्तम्बस्य शासनात्

→ तीनों में दोष → श्रावणी में ही: आपस्तम्ब के शासन से पूर्णिमा नित्य है।

▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१५१): आपस्तम्बैराथर्वणैश्च प्रौष्ठपद्याम् → श्रावणी दूषित हो तो आपस्तम्ब और आथर्वण प्रौष्ठपदी (भाद्रपद पूर्णिमा) पर।

महत्वपूर्ण: आपस्तम्ब के गृह्यसूत्र में पञ्चमी या हस्त का उल्लेख नहीं है: वे काण्व-माध्यन्दिन के विकल्प हैं। अतः आपस्तम्बी पञ्चमी/हस्त नहीं ले सकते।

५.२ बौधायन: भाद्रपद, फिर आषाढ

▶ बौधायन-सूत्र (स्मृतिमुक्ताफल पृ.१३३)

श्रावण्यां पौर्णमास्यामाषाढ्यां वोपाकृत्य तैष्यां माघ्यां वोत्सृजेयुः

→ श्रावण पूर्णिमा या आषाढी पर उपाकर्म करके तैषी या माघी पर उत्सर्जन करें।

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८)

बौधायनानां श्रावणी पौर्णमासी मुख्या: दोषसम्भावनया तद्भावे आषाढ इति विशेषः

→ बौधायन: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य; दोष की सम्भावना में आषाढ।

▶ निर्णयसिन्धु (पृ.१५१): सूत्र का अर्थ कैसे लें

श्रावण्यामपि ग्रहणादिदुष्टायां कातीयभिन्नैः प्रौष्ठपद्यां कार्यम् । तैस्तु श्रावणपञ्चम्याम् … आपस्तम्बैराथर्वणैश्च प्रौष्ठपद्याम् ॥ यत्तु बौधायनः 'श्रावण्यां पौर्णमास्यामाषाढ्यां वोपाकृत्य' इत्यूचे, तत् प्रौष्ठपद्यामपि दोषे आषाढ्यां कार्यमित्येवमर्थम् । तच्छाखीयविषयं वा ॥

→ श्रावणी ग्रहण आदि से दूषित हो तो कातीयों को छोड़ सभी प्रौष्ठपदी में; कातीय श्रावण पञ्चमी में; आपस्तम्ब और आथर्वण प्रौष्ठपदी में। बौधायन के "श्रावणी या आषाढी" का अर्थ है: प्रौष्ठपदी में भी दोष हो तो आषाढी; अथवा यह उनकी अपनी शाखा-विषयक बात है।

अतः बौधायन की आषाढी भाद्रपद के बाद अन्तिम उपाय है, वही क्रम जो वसिष्ठ सभी के लिए देते हैं (नियम ७): श्रावण → भाद्रपद → आषाढ, और आषाढ तभी लिया जाता है जब वह स्वयं दोष-रहित हो।

५.३ हिरण्यकेशी

▶ धर्मसिन्धु (पृ.१०८)

हिरण्यकेशीनां श्रावणी पौर्णमासी मुख्यकाल: तदभावे श्रावणहस्त

→ हिरण्यकेशी: श्रावणी पूर्णिमा मुख्य काल है; वह न मिले तो श्रावण में हस्त नक्षत्र; वह भी शुद्ध न हो तो भाद्रपद में हस्त नक्षत्र। वही हस्त लिया जाता है जो सूर्योदय को व्याप्त करे और संगव काल को स्पर्श करे; संगव काल तक न पहुँचे तो पूर्वविद्ध दिन (पिछला दिन) लिया जाता है। श्रावण शुक्ल पञ्चमी उनके सूत्र में नहीं है, अतः नहीं ली जाती; भाद्रपद पूर्णिमा भी नहीं ली जाती।

५.४ काण्व और माध्यन्दिन/वाजसनेयी

▶ स्मृतिमहार्णव (निर्णयसिन्धु पृ.१७७ + स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५५-५६)

संक्रान्तिग्रहणञ्चापि पौर्णमास्यां यदा भवेत् । उपाकरितस्तु पञ्चम्यां कुर्यात् वाजसनेयिभिः ।

→ पूर्णिमा पर संक्रान्ति/ग्रहण → वाजसनेयी पञ्चमी में उपाकर्म करें।

श्रावण मास में द्वि-शर्त नियम अटल है: पञ्चमी केवल हस्त नक्षत्र के साथ ही मान्य है; दोनों में से कोई एक अकेले पर्याप्त नहीं। यदि श्रावण पञ्चमी + हस्त शुद्ध न हो, तो भाद्रपद पूर्णिमा ली जाती है; वह भी शुद्ध न हो, तो भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी, भाद्रपद में कोई नक्षत्र-शर्त नहीं।

५.५ सामवेद

▶ गोम्भिल (स्मृतिकौस्तुभ पृ.१५३ + स्मृतिमुक्ताफले पृ.३२)

पर्वण्योदियके कुर्युः श्रावणी तैत्तिरीयकाः । बहूचाः श्रवणक्षे तु हस्तक्षे सामवेदिनः ।

→ तैत्तिरीय → पूर्णिमा। बहूच → श्रवण। सामवेद → हस्त।

सामवेद के तीन अनूठे नियम:

• सिंहस्थ-सूर्य केवल सामगानाम् के लिए श्रावण-गत हस्त/पूर्णिमा रोकता है

• अधिकमास सामवेद के लिए अनुमत (तिथिनिर्णयम्: 'सामगानां त्वधिमासेऽपि भवति'): अन्य के लिए नहीं

• उपाकर्म अपराह्ण में; उत्सर्जन पूर्वाह्ण में

• सिंह-भाद्रपद बाधित हो → कन्या-मास अपरपक्ष हस्त नक्षत्र विकल्प

अध्याय ६: उपाकर्म और उत्सर्जन का काल

यहाँ दो अलग प्रश्न हैं, और ग्रन्थ दोनों का उत्तर देते हैं।

कौन सा दिन: ऋक् और यजुस् के लिए पूर्वाह्ण, सामवेदियों के लिए अपराह्ण दिन निश्चित करता है। तिथिनिर्णय: एतच्च सामगैरपराह्णे कार्यम् । इतरैः पूर्वाह्णे ।; प्रचेता (NS पृ.१४८): भवेदुपाकृतिः पौर्णमास्यां पूर्वाह्ण एव तु ।। इसी कारण पूर्णिमा या श्रवण सूर्योदय से संगव तक व्याप्त हो (नियम ३), और साम का हस्त अपराह्ण से परखा जाता है।

उस दिन कर्मों का क्रम: स्मृतिमुक्ताफल बताता है: प्रातःकाल उत्सर्जन और उसके होम का है; उपाकर्म प्रातः के अनेक कर्मों के बाद अपराह्ण में (नियम १० में सूचीबद्ध)।

▶ स्मृतिमुक्ताफल (पृ.१३५)

अध्यायानामुपाकर्म कुर्यात्कालेऽपराह्णिके । पूर्वाह्णे तु विसर्गः स्यादिति वेदविदो विदुः ॥ उपाकर्मणि चोत्सर्गे यथाकालं समेत्य च । ऋषीन् दर्भमयान् कृत्वा पूजयेत्तान् द्विजस्ततः ॥

→ उपाकर्म: अपराह्ण। उत्सर्जन: पूर्वाह्ण। वेदज्ञों का यही मत है। दोनों में दर्भमय ऋषि बनाकर पूजा।

▶ स्मृतिमुक्ताफल (पृ.१३५), छन्दोगाभिहिताः

छन्दोगाभिहिताः कुर्युः प्रातरुत्सर्गिकीं क्रियाम् । अपराह्णेऽप्युपाकर्म पुष्यहस्तर्क्षयोर्द्विजाः ॥

→ प्रातः: उत्सर्जन; अपराह्ण: उपाकर्म।

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१५७)

तेषां हि अपराह्ण उपाकर्मकालः

→ उनका उपाकर्म-काल अपराह्ण है।

जब उपाकर्म और गायत्री जप एक ही दिन हों (नियम ३), तो क्रम है: पहले गायत्री जप, फिर उपाकर्म, "प्रातःकाल के बाद" के अर्थ में अपराह्ण।

अध्याय ७: सर्वथा-लोप सिद्धान्त और अहोबिल-मठ

७.१ आपद्धर्म सिद्धान्त

▶ निर्णयसिन्धु

सर्वथा कर्मलोपप्राप्तौ शाखान्तरोक्तकालानामाग्रहत्वम् आवश्यकम्

→ जब कर्म का सर्वथा लोप हो: अन्य शाखाओं के काल अनिवार्य रूप से ग्रहण करने योग्य हो जाते हैं।

यह सामान्य शाखा-मिश्रण नहीं: आपद्धर्म है। केवल तभी लागू होता है जब कर्म वास्तव में अन्यथा असम्भव हो।

७.२ आपस्तम्ब के लिए सर्वथा-लोप क्यों नहीं?

व्यास और बृहस्पति एक शाखा-अन्तर्गत समाधान देते हैं: श्रावणी पूर्णिमा + ग्रहण-शान्ति। उपाकर्म 'लुप्त' नहीं: शान्ति से संरक्षित है। अतः अहोबिल-मठ परम्परा आपस्तम्बियों को हस्त या पञ्चमी लेने की अनुमति नहीं देती।

७.३ ग्रहण-शान्ति की विधि

▶ बृहस्पति (स्मृतिमुक्ताफले पृ.३४)

शान्तिं कृत्वा तथोऽपि शुक्रदेवेन्द्रमन्त्रगैः । होमैर्नैजैर्गजपैरपि तयोरुदितमन्त्रकैः । कर्तव्यं श्रावणं विप्रेते जीवेन भावितम् ।

→ शुक्र-देवेन्द्र मन्त्रों से, होम और गजप से: शान्ति करके: फिर गुरु (बृहस्पति) से सम्पोषित श्रावण (उपाकर्म) करें।

अध्याय ८: उपाकर्म प्रयोग: संकल्प और विधि

८.१ उपाकर्म का अधिकारी

▶ SMP पृ.१४४

एतच्चोपाकरणं गृहस्थब्रह्मचारिणोः साधारणं कर्म । मन्वादिभिः गृहस्थधर्ममध्ये उपाकरणस्य विधानात्, उपाकर्म तथोत्सर्गं वनस्थानामपीष्यते । धारणाध्ययनं कृत्वा गृहिणां ब्रह्मचारिणामिति देवलस्मरणात्, अधीयीत गृहस्थोऽपि नियमाद् ब्रह्मचारिवदिति व्यासस्मरणात्, समावृत्तो ब्रह्मचारिकल्पेन यथान्यायमितर इति शौनकस्मरणाच्च ॥ अत्र ब्रह्मचारिकल्पेनेति … गृहस्थस्य मेखलाजिनदण्डरहितमुपवीतधारणं तर्पणहोमादिकमविरुद्धं कर्तव्यतयाऽवगम्यते ॥

→ उपाकर्म गृहस्थ और ब्रह्मचारी दोनों का साधारण कर्म है: मनु आदि ने इसे गृहस्थ-धर्म में कहा है; उपाकर्म और उत्सर्ग वानप्रस्थों के लिए भी इष्ट हैं (देवल: धारण और अध्ययन हेतु, गृहस्थ और ब्रह्मचारी); व्यास: गृहस्थ भी ब्रह्मचारी की भाँति नियम से अध्ययन करे; शौनक: समावृत्त ब्रह्मचारी-कल्प से। "कल्प" से गृहस्थ मेखला, अजिन और दण्ड के बिना उपवीत-धारण, तर्पण, होम आदि करे।

८.२ संकल्प

▶ DS पृ.९४

अधीतानां छन्दसामाप्यायनद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमुपाकर्मदिने अद्योत्सर्जनाख्यं कर्म करिष्ये

→ उपाकर्म-दिन के उत्सर्जन हेतु: "अधीत छन्दों के आप्यायन द्वारा श्रीपरमेश्वर की प्रीति के लिए आज उत्सर्जन नामक कर्म करूँगा।"

▶ DS पृ.९४

अधीतानामध्येष्यमाणानां च छन्दसां यातयामतानिरासेनाप्यायनद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थम्

→ उपाकर्म हेतु: "अधीत और अध्येष्यमाण छन्दों की यातयामता दूर कर आप्यायन द्वारा श्रीपरमेश्वर की प्रीति के लिए।"

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१६१)

...श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थे... छन्दस्सामाध्ययनद्वारा... सहोपाकर्मं करिष्ये इति संकल्पं कुर्यात्

→ नूतन ब्रह्मचारी का संकल्प, आचार्य और शिष्यों के साथ।

८.३ प्रथम उपाकर्म (नूतन ब्रह्मचारी), स्मृतिमुक्ताफल के अनुसार

कब किया जा सकता है। गुरु या शुक्र के मौढ्य या मलमास में नहीं, और कर्कस्थ सूर्य में नहीं; गौतम की अनुमति केवल शान्ति के बाद लागू है (SMP पृ.१४१)।

▶ वृद्ध-मनु (SMP पृ.१४१)

गुरुभार्गवयोर्मौढ्ये मलमासे तथैव च । प्रथमोपाकृतिर्न स्यात्कुर्याच्चेत्स विनश्यति ॥

→ गुरु और शुक्र के मौढ्य में, और मलमास में, प्रथम उपाकर्म न हो; जो करे वह नष्ट होता है।

▶ SMP पृ.१४२

प्रथमोपक्रमे प्राप्ते कुलीरस्थे रवौ सति । उपाकर्म न कुर्वीत कुर्यात् सिंहस्थिते रवौ ॥

→ प्रथम आरम्भ कुलीर (कर्क) के सूर्य में आए तो उपाकर्म न करें; सिंहस्थ सूर्य में करें।

क्या नया धारण होता है। व्रत में धारण की जाने वाली सभी वस्तुएँ नई, पुरानी त्याग दी जाती हैं।

▶ SMP पृ.१४६

मेखलामजिनं दण्डं वस्त्रं यज्ञोपवीतकम् । पूर्वोपयुक्तमुत्सृज्य धारयेयुर्नवं व्रते ॥

→ पहले प्रयुक्त मेखला, अजिन, दण्ड, वस्त्र और यज्ञोपवीत त्याग कर व्रत में नए धारण करें।

▶ स्मृतिसार (SMP पृ.१४५)

मौञ्जीयज्ञोपवीतादि नवमेव तु धारयेत् । कटिसूत्रञ्चापि नवं नवं वस्त्रमुपाकृतौ ॥

→ उपाकर्म में नई मौञ्जी, यज्ञोपवीत आदि, नया कटिसूत्र और नया वस्त्र धारण करें।

यज्ञोपवीत-धारण।

▶ भरद्वाज (SMP पृ.१४४-१४५)

अथ यज्ञोपवीतस्य धारणे कथ्यते विधिः । स्नात्वा शुद्धः शुचौ देशे प्रक्षालितपदद्वयः ॥ करद्वन्द्वपवित्रश्च कृतोपस्पर्शनो द्विजः । उपविश्यासने दार्भे प्राणानायम्य वाग्यतः ॥ मन्त्रं सदैवमुच्चार्य ब्रह्मसूत्रं गले क्षिपेत् । दक्षिणं बाहुमुद्धृत्य शिरसैव सह द्विजः ॥

→ स्नान करके, शुद्ध, पवित्र स्थान में, दोनों पैर धोकर, दोनों हाथों में पवित्र और आचमन करके, दर्भासन पर बैठकर, मौन प्राणायाम करके, मन्त्र उच्चारण कर ब्रह्मसूत्र गले में डाले, दाहिना हाथ सिर सहित ऊपर उठाकर। गृहस्थ और वानप्रस्थ प्रत्येक सूत्र के लिए मन्त्र और आचमन करें।

▶ शाण्डिल्य (SMP पृ.१४५)

आर्द्रवासा न कुर्वीत कर्म किञ्चित्कथञ्चन । राक्षसं तद्धि विज्ञेयं तस्माद्यत्नेन वर्जयेत् ॥ उपवीतादिकं धार्म्यमुपाकर्मणि तन्नवम् । अनवं वा नवं वाऽपि पुरातनमिह त्यजेत् ॥

→ गीले वस्त्र में कोई कर्म न करें: वह राक्षस है। उपाकर्म में उपवीत आदि नए हों; पुराना, नया हो या न हो, त्याग दें।

वपन। उपाकर्म में ब्रह्मचारी का वपन होता है (वैखानस: श्रावण्यां पौर्णमास्यां शिष्यं वापयित्वा), चौल या उपनयन के छः मास के भीतर भी, और इसके लिए तिथि-वार का विचार नहीं।

▶ SMP पृ.१४६

क्षुरकर्म न कर्तव्यं चौलात्परमृतुत्रयम् । तथोपनयनादूर्ध्वमुपाकर्म विना क्वचित् ॥

→ चौल के बाद तीन ऋतु, और उपनयन के बाद, उपाकर्म को छोड़कर क्षौर न करें।

काण्डर्षि तर्पण और ऋषि-पूजा। तैत्तिरीयों के लिए उपाकर्म का तर्पण काण्डर्षि तर्पण है: तैत्तिरीय संहिता के काण्डों के ऋषि, प्रजापति जिनमें प्रमुख हैं।

▶ कपर्दी (SMP पृ.१४६)

प्रजापतिमुखान् देवानेकैकांस्त्रिस्तिलोदकम् । उद्धृत्य तर्पणं कुर्युः श्रावण्यां तैत्तिरीयकाः ॥

→ श्रावणी पर तैत्तिरीय प्रजापति आदि काण्डर्षियों को एक-एक करके तिलोदक से तीन-तीन बार तर्पण करें।

उपाकर्म और उत्सर्ग में दर्भमय ऋषि बनाकर पूजा (SMP पृ.१३५)। प्रथम आरम्भ में पहले स्वस्तिवाचन और नान्दी-श्राद्ध (वृद्धि-श्राद्ध) (DS पृ.९३; NS पृ.१४८, नारायणवृत्ति)।

▶ स्मृतिकौस्तुभ (पृ.१६१) होम-क्रम जोड़ता है: नूतन कटिसूत्र; स्वस्ति-पुण्याहवाचन; नान्दी-श्राद्ध; संकल्प; गृहाग्नि के समीप; सावित्रीं ब्राह्मणम्… से अन्वाधान; प्रधान-देवता सावित्री, ब्रह्मणस्पति, अनुमति, अग्नि, शकुनी, मित्रावरुणौ, आपः, मरुतः, देवब्रह्माणि, इन्द्रसोमौ, पवमान सोम।

८.४ ग्रहण-शान्ति विधि

▶ बृहस्पति (SMP पृ.१४१)

शान्तिं कृत्वा तयोर्वाऽपि शुक्रदेवेन्द्रमन्त्रिणम् । होमदानैर्जपैर्वाऽपि तयोरुदितमन्त्रकैः ॥ कर्तव्यं श्रावणं विप्रैरिति जीवेन भाषितम् ॥

→ शुक्र और बृहस्पति (देवेन्द्र-मन्त्री) दोनों की शान्ति, उनके कहे मन्त्रों से होम, दान या जप द्वारा करके, ब्राह्मण श्रावण कर्म करें, ऐसा जीव (बृहस्पति) ने कहा।

▶ पद्धति (SMP पृ.१४२)

बृहस्पते अति यदिति बृहस्पतेः, प्र वः शुक्रायेति शुक्रस्य, आप्यायस्वेति मलमासे सोमस्य, सूर्योपरागे सङ्क्रान्तौ च चित्रं देवानां उदु त्यं जातवेदसं, सूर्यो देवीमुषसं उद्वयं तमसस्परि आ सत्येन, देवो वः सवितोत्पुनात्विति सूर्यस्य, सोमोपरागे सोमो धेनुमिति षड्भिः नवो नव इति च सोमस्य शान्तिहोमं कृत्वोपाकरणाङ्गहोमं कुर्यादिति ॥

→ शान्ति-होम: बृहस्पते अति यद् (गुरु); प्र वः शुक्राय (शुक्र); आप्यायस्व (मलमास, सोम); सूर्य-ग्रहण और संक्रान्ति में चित्रं देवानाम्, उदु त्यं जातवेदसम्, सूर्यो देवीमुषसम्, उद्वयं तमसस्परि, आ सत्येन, देवो वः सविता उत्पुनातु (सूर्य); चन्द्र-ग्रहण में सोमो धेनुम् से छः मन्त्र और नवो नवः (सोम); फिर उपाकर्म-होम।

उपसंहार: धर्मशास्त्र की प्रतिभा

आपस्तम्ब गृह्यसूत्र से लेकर स्मृतिकौस्तुभ तक: सभी छः प्रमाण और अहोबिल-मठ परम्परा एक परम सिद्धान्त पर केन्द्रित होते हैं:

न वेदाध्ययनस्य लोपः धर्मे भवति कदाचन

na vedādhyayanasya lopaḥ dharme bhavati kadācana

अर्थ: धर्म में वेदाध्ययन का लोप कभी नहीं होता।

इस षट्-प्रमाण विश्लेषण के मुख्य निष्कर्ष:

• ग्रहण और संक्रान्ति = काल-दोष → सभी उपाकर्म बाधित (नित्यकर्म भी)

• गुरु-अस्त और शुक्र-अस्त = ग्रह-दोष → श्रावण पूर्णिमा पर केवल प्रथम बाधित (प्रयोगपारिजात, मदनरत्न); पर ग्रहण या संक्रान्ति से दिन हटे तो विकल्प-दिन सभी के लिए अस्त-मुक्त हो (वसिष्ठ)

• काल-त्रय नियम (तीनों मास दूषित) → व्यास + बृहस्पति → श्रावणी + शान्ति: यही अहोबिल-मठ नियम का मूल स्रोत

• प्रत्येक शाखा का अपना विकल्प-क्रम: आपस्तम्ब → भाद्रपद; बौधायन → भाद्रपद, फिर आषाढ (निर्णयसिन्धु); हिरण्यकेशी → श्रावण में हस्त, फिर भाद्रपद में हस्त; काण्व/माध्यन्दिन → श्रावण पञ्चमी+हस्त, फिर भाद्रपद पूर्णिमा, फिर भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी: परस्पर विनिमेय नहीं

• सिंहस्थ-सूर्य निषेध = केवल सामगानाम् (निर्णयसिन्धु पृ.१७२); अन्य शाखाओं के लिए सिंहस्थ नर्मदा-उत्तर में उचित काल

• नर्मदा-नियम समुदाय की रीति का है; भारत के बाहर उसका पालन कुलाचार से होता है, स्थान से नहीं

• दिन का निर्णय पूर्वाह्ण से (सामवेदियों के लिए अपराह्ण से); उस दिन उत्सर्जन और होम पूर्वाह्ण में, उपाकर्म स्वयं अपराह्ण में (तिथिनिर्णय, निर्णयसिन्धु, स्मृतिमुक्ताफल)

• स्मृतिकौस्तुभ परिमार्जन: अतीत ग्रहण/संक्रान्ति (मध्यरात्रि के बाद समाप्त) → दोष नहीं

एक ही वर्ष में विभिन्न शाखाएँ विभिन्न दिनों पर आ सकती हैं: आपस्तम्ब और बौधायन भाद्रपद पूर्णिमा पर, हिरण्यकेशी हस्त पर, वाजसनेयी पञ्चमी पर, और कोई शुद्ध दिन न हो तो सभी शान्ति-सहित श्रावणी पर। यह विरोध नहीं; प्रत्येक परम्परा अपनी प्रमाण-श्रृंखला से उसी दायित्व तक पहुँचती है।

अपनी शाखा की सही तिथि पर उपाकर्म करें। वेद कभी मौन नहीं होगा।

पण्डित महेश शास्त्रीजी

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भाग ३: पाठ-विवेचन

प्रमाण एकमत नहीं हैं। तालिका में प्रत्येक मतभेद और इस लेख में स्वीकृत मत, आधार सहित, अंकित है।

प्रश्न

प्रमाणों के मत

स्वीकृत मत और आधार

क्या ग्रहण और संक्रान्ति द्वितीय कर्ता को रोकते हैं?

हाँ, सभी को: NS पृ.१४६ (हेमाद्रि; गार्ग्य), DS पृ.९२, TN पृ.१५, SMP पृ.१३८, VPV। केवल प्रथम को: AG §३४, वैदिक सार्वभौम के आधार पर (अत्र ग्रहणसङ्क्रमणवर्जनस्मरणं प्रथमोपाकृतिविषयम्)।

सभी को रोकते हैं (नियम ४): वचनों और निबन्धों का भार, और दोष-युक्त पर्व के विरुद्ध गार्ग्य की स्पष्ट चेतावनी।

क्या द्वितीय कर्ता गुरु/शुक्र-अस्त वाला विकल्प-दिन ले सकता है?

अस्त में द्वितीय की अनुमतियाँ (TN पृ.१५; DS पृ.९२; AG §३४) विकल्प-दिनों की बात नहीं करतीं; बृहस्पति और AG के विकल्प-क्रम प्रथम उपाकर्म के लिए हैं। SMP पृ.१४२-१४३ अनुमति को भी बलवान शाखाधीश पर आश्रित करता है।

नहीं (नियम ७): वसिष्ठ (SMP पृ.१३८-१३९) मौढ्य को ग्रहण और संक्रम के साथ मास-दूषक दोष गिनाते हैं और प्रत्येक विकल्प को उसी सूची से परखते हैं, प्रथम-द्वितीय भेद के बिना।

बौधायन के लिए आषाढी का स्थान

बौधायन-सूत्र: श्रावणी या आषाढी (SMP पृ.१३३)। DS पृ.९१: आषाढ विकल्प। व्यास (SMP पृ.१३९): श्रावणी, आषाढी, प्रौष्ठपदी क्रम से। वसिष्ठ: प्रौष्ठपदी पहले, आषाढी बाद। NS पृ.१५१: आषाढी तभी जब प्रौष्ठपदी भी दूषित हो।

श्रावण → भाद्रपद → आषाढ (नियम ८): NS सूत्र का यही अर्थ करता है, और यह वसिष्ठ से मेल खाता है।

क्या आपस्तम्ब भाद्रपद के बाद आषाढ जाता है?

NS पृ.१५१ और DS पृ.९१: केवल भाद्रपद। वसिष्ठ (सामान्य): प्रौष्ठपदी के बाद आषाढ।

हाँ, शान्ति-सहित श्रावणी से पहले अन्तिम चरण के रूप में (नियम ८), वसिष्ठ के सामान्य क्रम से।

पूर्वाह्ण और अपराह्ण

NS पृ.१४८ (प्रचेता; गोभिल-वचन साम-विषयक) और TN पृ.१६ अ-सामवेदियों को पूर्वाह्ण और सामगों को अपराह्ण देते हैं। SMP पृ.१३५ उपाकर्म अपराह्ण और उत्सर्जन पूर्वाह्ण में कहता है।

विरोध नहीं (नियम १०): पूर्वाह्ण (सामवेदियों के लिए अपराह्ण) वह काल है जिससे दिन निश्चित होता है; SMP उस दिन कर्मों का क्रम देता है: उत्सर्जन और होम पूर्वाह्ण में, उपाकर्म अपराह्ण में।

नर्मदा और कर्कस्थ सूर्य

SMP पृ.१४०, NS पृ.१४७, TN पृ.१५ में प्रादेशिक व्यवस्था; NS सिंह-नियम को सामगों तक सीमित करता है; SMP केवल आन्ध्र, महाराष्ट्र, कर्णाटक और कायस्थों को दाक्षिणात्य मानता है।

समुदाय-रीति का नियम; भारत के बाहर कुलाचार के रूप में (स्मृत्यर्थसार: यथा स्वकुलाचारम्), स्थान से लागू नहीं (नियम ११)।

अधिक वर्ष में द्वितीय कर्ता

DS पृ.९२ और NS पृ.१४८: मलमास में किसी के लिए नहीं। AG §३४ (१९८५, १९४७ के उदाहरण): द्वितीय अधिक पूर्णिमा पर। TN पृ.१६: सामग अधिमास में भी।

सभी के लिए निज मास (नियम ५), DS और NS के अनुसार।

सिंहस्थ गुरु

DS पृ.९२ प्रत्येक शाखा के लिए सिंहस्थ गुरु में प्रथम उपाकर्म वर्जित करता है।

सामवेद-निर्णय में लागू; अन्य वेदों के लिए विचाराधीन।

ग्रन्थसूची

प्राथमिक ग्रन्थ, उपयुक्त संस्करण

आह्निक ग्रन्थ, भाग २। श्री अहोबिल मठ, इंक.; डॉ. वी. सदगोपन और नट्टेरि श्रीहरि पार्थसारथी। अनुबन्धम्, §३१-३५, पृ.३५-४३।

धर्मसिन्धु, काशीनाथ उपाध्याय कृत, राजवैद्य रविदत्त शास्त्री के हिन्दुस्तानी भाषान्तर सहित। द्वितीय परिच्छेद, पृ.८९-९४।

निर्णयसिन्धु, कमलाकर भट्ट कृत, भाषाटीका सहित। द्वितीय परिच्छेद, उपाकर्म-निर्णय, पृ.१४५-१५३।

स्मृतिमुक्ताफल, वैद्यनाथ दीक्षित कृत, वर्णाश्रमधर्मकाण्ड, तमिल व्याख्या सहित। उपाकरणम्, पृ.१३२-१४७।

तिथिनिर्णय, भट्टोजि दीक्षित कृत। श्रावणमास, पृ.१५-१६।

स्मृतिकौस्तुभ, अनन्तदेव कृत, पृ.१५३-१६१।

व्रत-पर्व-विवेक (हिन्दी)। प्रकरण २, पृ.४२-४३, और सामवेद उपाकर्म प्रसंग।

आपस्तम्ब गृह्यसूत्र, प्रश्न ७, हरदत्त की अनाकुला वृत्ति सहित।

निबन्धों द्वारा उद्धृत प्रमाण: मनु, वृद्ध-मनु, वसिष्ठ, व्यास, गार्ग्य, वृद्ध-गार्ग्य, गर्ग, बृहस्पति, कश्यप, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, गोभिल, प्रचेता, ज्योतिः-पराशर; हेमाद्रि, मदनरत्न, प्रयोगपारिजात, कालादर्श, स्मृतिमहार्णव, स्मृत्यर्थसार, पृथ्वीचन्द्र, तिथिदर्पण, वैदिक सार्वभौम (गृह्यरत्न, दशनिर्णयी), वैद्यनाथीय।

उद्धरण-रूप: पण्डित महेश शास्त्रीजी, उपाकर्म-निर्णय: ऋग्, यजुर् और साम वेद के उपाकर्म-दिन का निर्णय, mypanchang.com। उद्धरण से पाठ के पुनरुत्पादन का कोई अधिकार नहीं मिलता।

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